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आंखों का रखरखाव

आंखें शरीर की महत्वपूर्ण जननेंद्रियां हैं। अगर इन्हें शरीर का अनमोल अंग कहा जाए तो कोई भी अतिशयोक्ति नहीं होगी। परंतु आंखों में होने वाले रोग भी अनेकों प्रकार के होते हैं। अगर इनका वर्णन अलग अलग किया जाए। तब पृथक रूप से एक अलग पुस्तक का लेखन करना आवश्यक हो जाएगा। यहां पर हम आंखों की कुछ ही बीमारियों के बारे मे ही लिख कर पा रहे हैं। इस लेख में हम आपको कुछ ऐसी बीमारियों का जड़ी बूटियों द्वारा किये जाने वाले इलाज लिखने वाले हैं , जिनका उपयोग करें आप आसानी से आंखों की कुछ बीमारियों से अपना तथा अपनों का बचाव / बचाव कर सकते हैं। इसका कारण है कि इसमें वर्णन की जाने वाली वनस्पतियां लगभग सर्वत्र सुलभ होती हैं।

विशेष ध्यान देने योग्य

संसार का प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि कब्ज शारीरिक रोगों का घर है। इस जानकारी को प्रत्येक व्यक्ति कुछ बीमारियों तक ही जानता है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि , कब्ज आंखों के लिए भी नुकसानदायक है। इसलिए आंखों का इलाज करते समय यदि रोगी को कब्ज बना रहे। तब उसे पर्याप्त लाभ नहीं मिल पाता है , इसलिए जब भी आंखों का इलाज करें , तो सबसे पहले रोगी को कब्ज से निजात अवश्य दिलवा दे। इसके पश्चात ही चिकित्सा करें।

मनचाहे वर्षों तक आंखें नहीं दुखेंगी

आंखों के उत्तम से उत्तम इलाज बताने से पूर्व हमारी इच्छा है कि , हम आपको एक ऐसी बूटी के बारे मे बता दे , जिस के जितने भी फूल खाओगे उतने ही वर्ष तक आपकी आंखें नहीं दुखेंगी। इस औषधि का प्रयोग हमारे पूर्वज लोग बहुत पहले से करते आ रहे हैं। इसके प्रयोग द्वारा वह लोग अपनी आंखों को मनचाहे वर्षों तक न दुखें इसके लिए प्रयोग किया करते थे।

गांव और देहात में एक बूटी बड़ी ही सरलता से प्राप्त होती है , जिसे हम मुंडी बूटी कहते हैं। इसके फूल आप अपनी इच्छा के अनुसार लेकर किसी भी समय , बिना पानी के निगल लिया करें। केवल ध्यान यह रखना है कि नहीं बिना पानी के ही निकलना है , तथा चबाना बिल्कुल ही नहीं है। इस बूटीके आप जितने भी फूल एक-एक करके , एक बार में निकल जाएंगे , उतने वर्षों तक आपको नेत्रों की पीड़ा का कष्टदायक रोग नहीं होगा। इसके साथ ही उतने ही वर्ष आपकी आंखें भी नहीं दुखेंगी। यह एक आश्चर्यजनक और अनुभूत चिकित्सा है।

अक्सीर नेत्र

अब आप जिस नेत्र चिकित्सा के बारे में जानने जा रहे हैं , उसके प्रयोग से आंखों में होने वाला रोग फूला , जाला और आंखों में सफेदी हो जाना आदि मे तो आपको लाभ होगा ही , साथ ही अगर भोजन पचने में कठिनाई है , खांसी , दमा है या बिच्छू ने काट लिया है , तब भी इसका इलाज आसानी से कर सकते हैं।

बनाने की विधि

गांव में एक पौधा होता है जिसे हम आक या मदार कहते हैं। इसके संपूर्ण अंगो [ फूल , फल , पत्ती , टहनी और जड़ आदि ] को 20 से 25 किलोग्राम की मात्रा में इकट्ठा कर ले। इसके बाद इन्हें छाया में सुखा लें। जब सभी अंग खूब अच्छी तरह से सूख जाएं , तब उनको जलाकर राख बना ले। अब किसी मिट्टी के घड़े में यह राख डाल दे , इसके पश्चात राख के 8 गुना साफ पानी भी इस घड़े में भर दे। अब इस मिट्टी के बर्तन का मुंह किसी कपड़े से बांध दें , अब प्रत्येक दिन किसी लकड़ी से तीन या चार बार इस घड़े के पानी को हिला दिया करें , ताकि राख तथा पानी एक दूसरे में बिल्कुल गड्डमड्ड होकर मिल जाएं ,

लगभग 5 दिनों के बाद घड़े का पानी ऊपर से निकालकर निकाल लें। शेष द्रव्य को बाहर फेंक दें। इसके पश्चात घड़े से निकाले हुए पानी को किसी कढ़ाई में डालकर पकाना शुरू करें। जब कढ़ाई का पूरा पानी जल जल जायेगा , तब कढ़ाई में एक प्रकार का श्वेतसार बचेगा। इसे खुरचकर किसी वायुरोधी शीशी में भर लें। बस यही नेत्र अक्सीर है।

आँखों के रोगों का इलाज

रात को सोते समय इस औषधि को सलाई से , अथवा नीम की पत्ती के डंठल से , दोनों आंखों में एक बार लगा लिया करें। इस प्रयोग से आंखों के ऊपर बताए गए सभी रोग धीरे-धीरे ऐसे गायब होंगे , जैसे कभी थे ही नहीं। इस औषधि की एक चावल से भी कम मात्रा सेवन करने से ही खांसी , दमा और पाचन संबंधी रोग दूर हो जाते हैं।

बिच्छू के काट लेने पर

इस औषधि की इतनी ही [एक चावल की ] मात्रा , किंचित पानी में भिगोकर वृश्चिकदंश पर लगा देने से बिच्छू के कांटे का विष , तुरंत ही उतर जाता है , और रोगी हंसने लगता है

रतौंधी

इस रोग के रोगी को दिन में तो ठीक दिखाई पड़ता है , परंतु रात में उसे कुछ नहीं दिखाई पड़ता है। इसके लिए आप शाम को रीठे के छिलकों को पानी में भिगोकर रखें। सुबह होने पर इन छिलकों को पानी में खूब मलमल कर तथा छानकर किसी शीशी में सुरक्षित कर ले। इसका प्रयोग भी रात में किसी सलाई या नीम के डंठल से किया जाता है। 3 या 4 दिन के प्रयोग से ही रोगी की रतौंधी बिल्कुल ठीक हो जाती है

जय आयुर्वेद

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