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[ b/1 1 ] नकसीर

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 1  नकसीर  

यह एक ऐसा रोग है , जिसमें पीड़ित को कोई खास परेशानी तो नहीं होती है , परंतु नकसीर फूटने पर रोगी भय से आक्रांत ज्यादा हो जाता है | उसकी नाक से खून गिरने लगता है | कभी-कभी तो खून की धारा बहने ही लगती है | इस खून की धारा को देखकर रोगी डर जाता है | इस शारीरिक व्याधि को ही नकसीर कहते हैं | यह दिक्कत ज्यादातर व्यक्ति के जीवन में लगभग 8 वर्ष से शुरू होकर 40 वर्ष तक होती है | उसके बाद प्रायः यह परेशानी नहीं होती है | प्रत्येक प्राणी अपने जीवन में एक बार इस परेशानी से रूबरू अवश्य होना पड़ता है | कुछ मामलों में तो वृद्ध लोग भी इससे पीड़ित होते देखे गए हैं |

कारण 

यह दिक्कत ज्यादातर गर्मी के मौसम में होती है | इसका प्रमुख कारण है कि गर्मियों में गर्मी के कारण शरीर का रक्त पतला हो जाता है | इससे रक्त को शरीर के कोमल भाग जैसे नासिका के रास्ते निकलने में आसानी होती है | इसके अतिरिक्त भी रक्त अन्य जगहों से भी निकल सकता है |

जिन व्यक्तियों की प्रकृति पित्त प्रधान होती है , ऐसे लोगों का पित्त प्रकुपित होकर रक्त में मिल जाता है | इसके बाद पित्त रक्त के साथ मिलकर शरीर के विभिन्न भागों द्वारा भी बाहर निकलने लगता है | नासिका से निकलने वाला खून भी रक्तपित्त रोग के अंतर्गत ही आता है |

साधारण उपचार 

जब किसी को नकसीर फूट जाए तो दूसरे व्यक्तियों को उसकी भयावहता से डरना नहीं चाहिए | पीड़ित के उपचार के लिए कहीं से थोड़ी सी रूई इकट्ठी करें | उसके बाद पीड़ित को किसी हवादार और छायादार स्थान में लिटा दे | इसके बाद उसके चेहरे पर पानी के छींटे मार कर , उसकी नासिका छिद्रों मैं थोड़ी-थोड़ी रुई लगा दे | अगर हो सके तो उसे पंखे से हवा भी करते रहे | यदि पीड़ित इसी प्रकार धैर्यपूर्वक शांति से लगभग 30 मिनट तक लेट आ रहे , तो उसे नकसीर से आराम मिल जाता है | नकसीर ठीक हो जाने के बाद उसे कोई सुगंधित फूल सूंघने को दें |इसके अलावा अगर पीली मिट्टी मिल सके तो उसे पानी में भिगोकर सूंघने को कहें इससे भी नाक की ऊष्मा कम पड़ जाती है |

चिकित्सा करते समय यदि रोगी ने जूते मोजे पहने हुए तो उन्हें भी उतरवा दें , ताकि शरीर की गर्मी पैर के तलवों से बाहर निकलती रहे | \गंभीर स्थिति में इलाज 

यदि नकसीर की स्थिति ज्यादा गंभीर हो तथा नाक से खून बहना बंद न हो पा रहा हो | ऐसी स्थिति में कहीं से कुछ आँवले के फल इकट्ठा करें | इन फलों से बीज निकालकर उसके गूदे को सिल पर पीस लें | उसके बाद कपड़े से छानकर उसका रस निकाल ले | आंवले के इस रस को पीड़ित के दोनों नासा छिद्रों मैं टपकाए | गूदे का रस निकालने के बाद उसे फेंके नहीं , बल्कि उसको रोगी के सिर पर लेप कर दें , और रोगी को आराम करने दें | कुछ समय के पश्चात रोगी की नकसीर पूर्ण रूप से ठीक हो जाएगी | यदि ताजे हरे आंवले ना मिले तो सूखे आंवले से भी काम चलाया जा सकता है | इसका पानी तैयार कर नाक में डाला जा सकता है , तथा इसे पीसकर सिर पर भी लगाया जा सकता है |

अन्य इलाज 

इलाज करने के लिए चिकित्सक को चाहिए के वह किसी साफ बर्तन में बड़े वाले नींबू का रस निकाले | इस रस को पिचकारी की सहायता से पीड़ित के नाशाछिद्रों में प्रविष्ट करा दे | ऐसा करने पर देखा गया है कि इस चिकित्सा से एक ही बार में रोगी को पूरा आराम मिल जाता है , तथा उसका बहता हुआ खून भी बंद हो जाता है |

        यदि रोगी के दोनों नासा क्षेत्रों में केले के पत्तों का रस 10 -10 बूंद डालकर रोगी को आराम से लिटा दिया जाए तो भी आधा घंटे में रोगी को पूरा आराम मिल जाता है | इस तरीके से चिकित्सा करके भी नकसीर से आराम दिलाया जा सकता है |

           इसी प्रकार बेर के पत्तों को इकट्ठा करें | इन पत्तों को बिना धोए ही किसी सिलबट्टे पर महीन महीन पीस कर लुगदी बना ले | इस लुगदी को रोगी के सर पर गाढा गाढा लेप कर दें | इसके बाद रोगी को किसी हवादार कमरे में , आरामदायक बिस्तर पर लिटा दें | उसके बाद रोगी को निर्देश दें कि वह थोड़ी देर के लिए आराम से सो जाए | यदि आपके कहने के अनुसार रोगी ने चिकित्सा निर्देश का पालन किया होगा , तब उसे दो-तीन घंटे के बाद उसे पूर्णतया आराम मिल जाएगा |

       आपसे भी अनुरोध है कि ऊपर दी गई चिकित्सा विधियों में से किसी एक विधि का प्रयोग करें , और रोगी को चिकित्सा कर , रोग मुक्त करने का प्रयास करें , तथा अपने मन में विश्वास रखें कि आपको सफलता अवश्य मिलेगी |

जय आयुर्वेद

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