सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

[ l/1 ] कर्म और कर्तव्य

web - gsirg.com

कर्म और कर्तव्य

इस संसार में मुख्य रूप से 3 प्रकार की पुरुष पाए जाते हैं | जिनमें प्रथम और उचच स्थान पर उत्तम पुरुष माने गए हैं | इसके बाद क्रमशः मध्यम और निम्न प्रकृति के पुरुष आते हैं | इस संसार में आए प्रत्येक पुरुष को अपना जीवन यापन करने के साथ-साथ , उपरोक्त दो शब्दों [ कर्म और कर्तव्य ] से गहरा नाता बना ही रहता है | प्रत्येक मानव का यह नाता आज से नही बल्कि चिरकाल से बना हुआ है , और अनंत काल तक बना भी रहेगा , इससे कोई भी प्राणी दूर भाग नहीं सकता है |

कर्म और फल

इस संसार में आया हुआ प्रत्येक प्राणी कर्म से जुड़ा हुआ है | कर्म किए बिना कोई भी व्यक्ति संसार मे रह ही नहीं सकता है | अगर कोई यह चाहता है कि , वह कोई कर्म नहीं करेगा तो ऐसा होना असंभव ही है | प्राणी जैसे कर्म करता है , उसको वैसे ही फल भी मिलता है | बुरे कर्म करने पर उसे बुरा परिणाम , तथा अच्छा कर्म करने पर अच्छा परिणाम प्राप्त होता ही रहता है | यदि कोई यह सोचता है कि , वह कर्म न करके केवल विश्राम ही करेगा , यह उसकी यह एक प्रकार की भूल ही है , क्योंकि विश्राम करना भी एक प्रकार का कर्म ही है | इस मानदंड पर अगर देखा जाए तो कोई भी प्राणी कर्म से मुक्त नहीं है |

कर्तव्य

वैसे तो संसार में आया हुआ प्राणी तरह तरह के कार्य करता है , लेकिन जिन कार्यों को वह अपना दायित्व समझकर पूरा करता है , या पूरा करना आवश्यक समझता है , उस समय उसके कर्म अपने आप कर्तव्य के माध्यम से बंध जाते हैं | इसका परिणाम यह होता है कि व्यक्ति अपने कामों को किए बिना उस से मुक्त नहीं हो पाता है | कर्म और कर्तव्य का यह संगम , मानव को महामानव बना देता है , जिसके परिणाम स्वरुप वह अपने जीवन में पुरस्कारों से पुरस्कृत होता रहता है |

कर्म की स्वतंत्रता

जैसा कि हम जानते हैं कि कर्म , हर व्यक्ति के साथ अनवरत घटित होता रहता है | प्रत्येक प्राणी अपना कर्म करने के लिए स्वतंत्र है , साथ ही उसे अपने कर्मों की दिशा निर्धारित करने का भी अधिकार भी है | कर्म चाहे सकारात्मक दिशा में किया जाए अथवा विध्वंसक दिशा में , यह प्राणी के ऊपर निर्भर करता है | क्योंकि मनुष्य कर्म करने के लिए स्वतंत्र है | यह उसके चयन पर ही निर्भर करता है , परंतु यदि कोई प्राणी इसका स्वैच्छिक परिणामकारी फल , उसकी इच्छा के अनुरूप पाना चाहे , तो यह संभव नहीं है | क्योंकि मनुष्य कर्म करने के लिए स्वतंत्र है ,परंतु इसके परिणामों में उसे चुनाव की कोई सुविधा नहीं प्राप्त है |

कर्मफल का दाता ईश्वर

कर्म व्यक्ति को मुक्त कर सकता है , और उसे बांध भी सकता है | यही कारण है कि हर प्राणी को अपने कर्मों के अनुसार ही उसका फल भी प्राप्त करता है | प्राणी के कर्म फलों का दाता कोई और होता है , जिसे हम परमात्मा या भगवान कहते हैं | यदि निश्चित रूप से कहा जाए तो किसी व्यक्ति का , उसके कर्म फल पर किसी तरह का अधिकार या हस्तक्षेप नहीं होता है | यही कारण है कि प्राणी को बुरे कर्मों का परिणाम बुरा तथा अच्छे कामों का परिणाम अच्छा प्राप्त होता है | अपने अपने कर्मानुसार प्रत्येक प्राणी को इन दोनों प्रकार के कर्म फलों को भोगना ही पड़ता है | प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्यों से भी संबंधित होता है | यह तो सार्वभौमिक सत्य है कि , कर्म से व्यक्ति बंधा नहीं रह सकता है , और नहीं भी | इसके विपरीत कर्तव्य सदैव व्यक्ति को बांधता है | कर्तव्य को पूर्ण करने वाला व्यक्ति कभी भी पूर्ण रुप से स्वतंत्र नहीं होता है | यही कारण है कि जिन लोगों ने वैराग्य धारण किया हुआ है ,वह लोग सन्यासी अथवा विरागी हो जाते हैं | वह सबसे पहले अपने कर्तव्यों का त्याग करते हैं , उसके पश्चात ही कोई कर्म करते हैं | इस संसार में कर्म करने वाले प्रत्येक पुरुष की परीक्षा चार बातों से होती है , उसकी विद्या से , विनम्रता कुल तथा कार्य से | इन्हीं चार कसौटियों पर प्रत्येक व्यक्ति के कर्म और फल भी निर्धारित होते हैं |


किसी भी प्रकार के कर्म का फल चाहे जैसे भी हो , तथा उनके परिणाम भी चाहे जैसे हों , इनसे उदासीन रहने वाले केवल सन्यासी या विरागी ही होते हैं | क्योंकि कर्म करते समय वह सन्यास या विराग से प्रभावित अपने होकर कर्तव्यों के प्रति उदासीन हो जाते हैं | उनका इस संसार के प्रति कोई कर्तव्य नहीं होता है | उक्त के अनुकरण से ही उनके '' मुक्त पुरुष '' होने का बोध होता है | ऐसे में उनकी सोच इस प्रकार की हो जाती है कि वे चाहे कोई कर्म करें या ना करें , इससे कुछ नहीं होगा | यह लोग ऐसा कभी नहीं सोचते | उनका विचार इसप्रकार का होता है कि वह अगर वह कुछ नहीं करेंगे तो , संसार में कुछ नहीं होगा | उनका ऐसा सोचना निरर्थक ही होता है |

प्रत्येक व्यक्ति को कर्म करते समय गंभीर और निष्काम दोनों तरह का होना चाहिए | जब यह किसी कार्य को कर सकते हो तभी उनमें कार्य करने की गंभीरता का पुट होना चाहिए | अगर उनमे किसी कार्य को करने की सामर्थ्य हो तो , उन्हें पूरी तन्मयता और लगन के साथ उस कार्य को करना प्रारंभ कर देना चाहिए | इसके विपरीत यदि काम सामर्थ्य से बाहर हो तो , उसके लिए निष्काम होते हुए आनंद मनाना चाहिए , और खुश रहना चाहिए |

प्रत्येक व्यक्ति की भलाई इसी में है कि वह अपने कर्मों की गति में सुधार करें , तथा बेकार के कर्तव्यों के जंजाल में न उलझें | प्रत्येक व्यक्ति के लिए जीवन में आवश्यक कर्तव्यों का पालन करते हुए अपना कर्म करना चाहिए |

इति श्री

web - gsirg.com

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

इलाज ; एसिड अटैक [1/15 ] D

web - gsirg.com इलाज ; एसिड अटैक के क्या कारण आजकल अखबारों में तेजाब से हमले की खबरें पढ़ने को मिल ही जाती हैं। तेजाब से हमला करने वाले व्यक्ति प्रायः मानसिक बीमार या किसी हीनभावना से ग्रस्त होते हैं। ऐसे लोग अपनी हीनभावना को छिपाने तथा उसे बल प्रदान करने के लिए अपने सामने वाले दुश्मन व्यक्ति पर तेजाब से हमला कर देते हैं। कभी-कभी इसका कारण दुश्मनी भी होता है , इसके अलावा कभी-कभी लोग अपनी आत्मरक्षा के लिए भी एसिड अटैक का अवलंबन कर लेते हैं। कारण कुछ भी हो किंतु इसमें पीड़ित को कई प्रकार की परेशानियों का सामना करना ही पड़ता है। ऐसे हमलों का होना या ऐसी घटनाएं होना हर देश में आम बात हो गई है। इस्लामी देशों में लड़कियों को उनकी किसी त्रुटि के कारण तो ऐसी धमकियां खुलेआम देखने को मिल जाती हैं। \\ शरीर का बचाव \\ यदि के शरीर किसी पर तेजाब से हमला होता है , उस समय शरीर के जिस भाग पर तेजाब पड़ता है , वहां पर एक विशेष प्रकार की जलन होने लगती है | इस हमले में शरीर का प्रभावित भाग बेडौल , खुरदरा और भयानक हो सकता है | इस हमले से पीड़ित व्यक्ति शरीर की त...

धर्म ; प्रगति का एकमात्र उपाय है तपश्चर्या [ 19 ]

Web - 1najar.in प्रगति का एकमात्र उपाय है तपश्चर्या प्रत्येक व्यक्ति के जीवन के दो ही प्रमुख क्षेत्र हैं | इसमें में प्रथम है , भौतिक क्षेत्र , तथा दूसरा है आध्यात्मिक क्षेत्र | इस भौतिक संसार का प्रत्येक प्राणी इन्हीं दो क्षेत्रों में से ही किसी एक को अपने जीवन में क्रियान्वित करना चाहता है | अपने प्रयास से उसको उस क्षेत्र में सफलता लगभग मिल ही जाती है | दोनों ही क्षेत्रों में सफलता के लिए केवल एक ही नियम काम करता है | उस नियम का नाम है तपश्चर्या | प्रत्येक क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को अभीष्ट श्रम करना पड़ता है | इसके लिए उसे प्रयत्न , पुरुषार्थ , श्रम और साहस का अवलंबन लेना पड़ता है | सफलता को पाने में यह सभी तत्व महत्वपूर्ण है | फिर भी प्रयत्न का एक अलग ही स्थान है | प्रयत्न परायणता यह तो सर्वविदित है कि व्यक्ति चाहे किसान हो , मजदूर हो , शिल्पी हो , पहलवान हो , कलाकार हो , चपरासी हो या अखबार हो अथवा कुछ भी हो उसको सफलता प्राप्त के सभी पायदानों को अपनाना ही पड़ता है | व्यक्ति के ...

धर्म ; सफलता देने तथा धनवर्षिणी साधनाएं [ भाग - एक ]

web - gsirg.com धर्म ; सफलता देने तथा धनवर्षिणी साधनाएं [ भाग - एक ] मेरे सम्मानित पाठकगणों आज हम सफलता प्रदान करने वाली कुछ साधनाओं के विषय पर चर्चा करेंगे , कि सफलता किसे कहते हैं ? हर व्यक्ति अपने जीवन में सफल होना चाहता है | परंतु सफलता का असली मार्ग क्या है ?वह या तो उसे जानता नहीं है या फिर जानने के बाद भी , उस पर चलना नहीं चाहता है , या चल नही पाता है | इस संबंध में संस्कृत के यह श्लोक उन्हें प्रेरणा दे सकता है | '' कर्मेण्य हि सिध्यंति कार्याणि न मनोरथै; सुप्तस्य एव सिंहस्य प्रविशंति मुखे न मृगाः '' अर्थ - मन में उत्पन्न होने वाली सभी आकांक्षाओं की पूर्ति , कर्म करने से ही होती है | जिस प्रकार एक सोता हुआ सिंह यदि कल्पना करे कि उसके मुंह में कोई मृग प्रवेश कर जाए , तो ऐसा संभव नहीं है | ठीक इसी प्रकार कर्म करने से ही मन में उत्पन्न होने वाली आकांक्षाओं की पूर्ति की जा सकती है , मात्र कल्पना करने से इच्छाओं की पूर्ति नही हो सकती है | यहाँ प्रत्येक मानव को यह जान लेना चाहिए...