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इलाज

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इलाज ; दिल की धड़कन की बीमारी का
हमारे शरीर में विभिन्न प्रकार के महत्वपूर्ण अंग हैं | इन महत्वपूर्ण अंगों में हृदय का प्रमुख स्थान है | यह शरीर के भीतर ,छाती के बाई ओर स्थित होता है | इस स्थान पर हाथ रख कर दिल की धड़कन का अनुभव किया जा सकता है | अगर हम यहां कान लगाकर सुने तो हमे दिल के धड़कन की आवाज भी साफ साफ सुनाई देगी | एक स्वस्थ व्यक्ति का हृदय नियमित रूप से 1 मिनट में लगभग 72 बार धड़कता है | यह धड़कन एक नियमित समय अंतराल पर होती रहती है | यदि इस समय अंतराल में अनियमितता मिले तब जान लेना चाहिए कि उस व्यक्ति को दिल धड़कन की बीमारी है |
रोग विचार
जब किसी कारण से दिल की धड़कन कम या ज्यादा हो जाती है , और नियमित रूप से होती रहती है | तब व्यक्ति इस रोग से पीड़ित हैं , यह जान लेना चाहिए | ऐसी अवस्था में दिल की धड़कन का नियमित रूप से बढ़ते जाना या कम होते जाना दोनों ही स्थितियां चिंता का विषय बन जाती है | कभी-कभी तात्कालिक प्रभाव से भी धड़कन बढ़ या घट जाया करती है |तथा अपनेआप ठीक भी हो जाया करती है , ऐसी स्थिति को रोग नहीं मानना चाहिए | परंतु नियमित रूप से धड़कन कम या ज्यादा होती रहे तब रोग माना जा सकता है |
धड़कन क्या है
इसको जानने के लिए हमें हृदय की बनावट जानना होगा | हमारा हृदय चार कोठियों में बंटा होता है | इसमें अशुद्ध रक्त लाने वाली और शुद्ध रक्त ले जाने वाली रक्त वाहिनियां होती है | इन चारों कोठियों में अनैच्छिक मांसपेशियां पेशियों के दरवाजे होते हैं , जो नियमित अन्तराल पर खुलते और बंद होते रहते हैं | यहां से रक्त ले जाने और रक्त आने पर एक विशेष प्रकार की आवाज होती रहती है | इसी आवाज को धड़कन कहते हैं | रक्त के संचरण की यह क्रियाएं 1 मिनट में 72 बार होती हैं | जब धड़कन की इस क्रिया 72 से कम या ज्यादा हो जाती है | उस समय दिल की आवाज आने में अंतर आ जाता है | इसी विशेष आवाज़ के अंतर हो जाने को ही दिल के धड़कने की बीमारी कहां जाता है |
हृदय रोग होने के कारण
दिल धड़कन में विकृति आने की बहुत से कारण हैं | इसमें रोगी का अनियमित आहार तथा बिहार प्रमुख है | दूषित वातावरण , विभिन्न प्रकार के रोग , दिल की धड़कन को प्रभावित करते हैं | जैसे
धड़कन कम होने के पूर्व रोगी को दस्त लगना , बवासीर या पेट के रोग होते रहते हैं | खून की कमी होना , टी ० बी ० की बीमारी या प्रमेह की शिकायत भी रोगी को दिल की धड़कन रोग होने से पूर्व हुआ करती है | इसके अलावा शरीर पर चर्बी का बढ़ जाना , धातु दुर्बलता और ब्लड प्रेशर भीदिल की धड़कन के कम होने के कारण हैं |
इसी प्रकार दिल के अधिक धड़कन के रोग के पूर्व रोगी को विभिन्न प्रकार की शारीरिक व्याधियां भी हो जाती है जैसे खांसी , हिचकी ,श्वास , दाह और चेचक आदि रोग ,रोगी को पहले से हुए होते हैं |
रोग की भयानक अवस्था
यदि किसी व्यक्ति को यह रोग काफी दिनों तक अपने गिरफ्त में लिए रहता है | यदि यह स्थिति लम्बे समय तक बनी रहे तब दिल की धड़कन की इस बीमारी को भयानक अवस्था में गिना जाता है | ऐसे में रोगी को थकावट तथा मूर्छा जैसी गंभीर अवस्थाओं से गुजरना पड़ सकता है | रोगी थोड़ा सा परिश्रम करने पर या फिर क्रोध और शोक करने पर मूर्छित अवस्था को भी पहुंच जाता है | ऐसी स्थिति में सबसे पहले रोगी की आंखों के आगे अंधेरा छा जाता है | इसके बाद रोगी बेहोश हो जाता है | प्रारंभ में बेहोशी की अवस्था थोड़े समय की होती है | बाद में की अवस्था बढ़ती चली जाती है | रोगी का मन किसी काम में नहीं लगता है , इसके अलावा उसे सभी खाद्य वस्तुएं अप्रिय लगने लगती है | यदि दिल की धड़कन पुरानी हो जाए तो , रोगी मे रस , रक्त , मांस , अस्थि , मज्जा और शुक्र धातु भी क्षीण हो जाते है |
साधारण उपचार
यदि रोगी को तीव्र गति अवस्था की धड़कन है | तब रोगी को विश्राम की आवश्यकता होती है | रोगी को शारीरिक और मानसिक विश्राम देना अति आवश्यक होता है | उसको चिंता , शोक , क्रोध , ईर्ष्या और द्वेष आदि विकृतियां पैदा करने वाली मानसिक क्रियाएं बंद कर देनी चाहिए | उसके भोजन में अदरक , प्याज और लहसुन का प्रयोग अधिक करना चाहिए | खाने में जो मसाले प्रयोग किए जाते हैं उनमें सोंठ , काली मिर्च , लौंग , दालचीनी और तेजपात विशेष हितकारी होती है | फलों में पपीता , अंगूर , सेब और अंजीर का प्रयोग करें | मेवा में मुनक्का , बादाम , काजू अखरोट , पिस्ता और खजूर का भी प्रचुर मात्रा में प्रयोग करना चाहिए | इसके अलावा शीतल पदार्थों के अधिक सेवन से बचना चाहिए |
औषधीय उपचार
इसके औषधीय उपचार के लिए अर्जुन की छाल का बारीक चूर्ण बना ले | इसकी 4 ग्राम मात्रा को 20 ग्राम खांड के साथ रोगी को सेवन करवायें | इस दवा को गाय के आधा किलो उबले हुए दूध के साथ दिया जाता है | जिस समय रोगी कोई दवा दी जाए ,उस समय रोगी को खाली पेट होना चाहिए | इस प्रकार इस दवा के नित्य प्रयोग से रोग अपनी तीव्रता के अनुसार धीरे-धीरे कम होता चला जाता है ,और अंत में रोग समूल नष्ट हो जाता है | ह्रदय की धड़कन के लिए यह दवा बहुत मुफ़ीद है | इसके साथ ही ऊपर लिखे उपचार को भी जारी रखें | इससे रोग को समाप्त होने में मदद मिलेगी |
जय आयुर्वेद

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