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पुरातनम् बीज बनाम अद्यतन

helpsir.blogspot.comआदरणीय सम्पादक जी
                               सादर प्रणाम        पुराने जमाने में रासायनिक खादों, उर्वरकों, कीटनाशकों के प्रयोग के बिना केवल गोबर की खाद से जो अन्न पैदा किया जाता था उस अन्न की खुश्बू, स्वाद लाजबाब होता था।खेत,खलिहानों, बागों,चरागाहों में चरकर आई गाय,भैंसों के दूध में गजब का स्वाद और प्रचुर मात्रा में औषधीय गुण होते थे।
       तब के देशी घी में भी गजब की सुगंध पाई जाती थी।खरा करने हेतु कड़ाही में गरम करते वक्त देशी घी की मोहक सुगंध फैल जाया करती थी।जिससे पड़ोसियों को भी पता हो जाता था कि अमुक घर में देशी घी बन रहा है।
     आयुर्वेद में अनुपान के रूप में जिस दूध का वर्णन मिलता है वह छुट्टि चरने वाली देशी गाय का दूध ही माना जाता है।खूंटे से बांधकर नांद में चारा,भूसा खिलाने वाली गाय के दूध में उतने औषधीय गुण नहीं होते हैं जितना छुट्टा चरने वाली गाय के दूध में पाए जाते हैं।
      देशी भूने चने में जो खुश्बू, सोंधापन गोबर की खाद से उपजाए चने में होती थी वह उर्वरकों से उत्पादित चनों में नहीं पाई जाती है।औषधीय गुण भी नहीं पाए जाते हैं।
      पुराने जमाने …
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रचनात्मक विपक्ष का अभाव

helpsir.blpgspot.comआदरणीय सम्पादक जी
                              सादर प्रणाम       विगत सरकार के(2014--2019)कार्यकाल के दौरान पूरे पाँच वर्ष कांग्रेस ने लगातार संसद बाधित रखी।कभी भी सुचारू और सृजनात्मक, रचनात्मक विपक्ष की भूमिका में नजर ही नहीं आई।मोदी और मोदी सरकार की बुराई में ही पाँच साल निकाल दिया।जन हित,समाज हित,लोक हित,में विपक्ष ने कभी भी सक्रियता नहीं निभाई।
      आज पारदर्शिता का युग है।युवा,और शिक्षित वर्ग सब कुछ देखता और समझता है।अब वह दिन गए जब जनता को लालीपॉप थमाकर पूरे पाँच वर्ष आप मलाई खाते रहते थे।अब जनता पढ़ी-लिखी और समझदार है।उसे सबसे पहले राष्ट्र हित दिखता है।और यह सही भी है।
       राष्ट्र हित से बढ़कर कोई हित हो ही नहीं सकता।पूरे पाँच साल संसद में हो-हुल्लड़ कर आप साबित क्या करना चाहते हैं? संसद किसी के बाप की बपौती नहीं है।यह लोकतंत्र है जो अच्छा काम करेगा।जनता उसी को सिर-आँखों पर बिठाएगी।दुबारा संसद जाने के लिए काम करना जरूरी है।इस बार फिर विपक्ष नें वहीं पुरानी वाली नौटंकी शुरू कर दी है।"एक राष्ट्र, एक चुनाव"के मुद्दे पर विचार-विमर्श के लिए सरकार ने …

वृहत्तर भारत

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आदरणीय सम्पादक जी
                            सादर प्रणाम        भारत वैसे तो भौगोलिक दृष्टिकोण से एक प्राय द्वीप है।लेकिन यदि वृहत्तर भारत की कल्पना की जाय तो हम किसी महाद्वीप से कम नहीं हैं।ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश रूपी हमारी भुजाओं को काट देनें के बाद भी हम एक विशाल देश के रूप में हैं।क्षेत्रफल और जनसंख्या के दृष्टिकोण से हम सुदृढ़ हैं।जनसंख्या में तो हम चीन को पछ़ाड़कर एक नं.पर पहुंचने के बिल्कुल करीब हैं।
          भगवान नें हमें प्राकृतिक सम्पदा देने में कोई भी कंजूसी नहीं की है।वन सम्पदा, वनौषधि सम्पदा, हिम सम्पदा,पशुधन, पक्षीधन,खनिज ईंधन ,नदी जल,को हाथों से भगवान नें भारत को लुटाया है।सुबह-सबेरे कोयल की तान,मयूर नृत्य, पक्षियों की चहचहाहट, मधुर कलरव गान से आम जनमानस के मन को मुग्ध कर देती है।नदियों की कल-कल,छल-छल ध्वनि कानों में प्रकृति का संगीत की मधुर ध्वनि घोलती है।भारत प्राकृतिक सम्पदा से भरपूर और प्राकृतिक आपदा से दूर है।    भारत को अगर किसी ने बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचाया है तो मुस्लिमों और बामपंथियों नें।मुस्लिमों की वजह से ईरान, अफगान…

भोजन की बर्बादी

helpsir.blogspot.inआदरणीय सम्पादक जी
                              सादर प्रणाम         भोजन का कण और आनन्द का क्षण कभी बर्बाद नहीं करना चाहिए।इसी एक -कण भोजन के लिए हम दिन रात कड़ी,हांड़-तोड़ मेहनत करते हैं।अन्न देवता के लिए ही किसान भगवान दिन-रात कठिन परिश्रम, हांड़-तोड़ मेहनत करके ही अन्न उपजाता है।चन्द्र भूषण त्रिवेदी"रमई काका"ने अपनी कृति "बौछार"में बड़ा ही सुन्दर विवरण अन्न देवता के लिए लिखा है।-----कहि रही घरैरिनि मुनुवा से रे पूतु अन्नु बिखराव न तुम।ए बड़े परिश्रम के मोती इनका माटी म मिलाव न तुम।।"अर्थात इन परिश्रम के मोती को बर्बाद न करने की सलाह कवि ने दी है।
        हमारे यहाँ शादी,पार्टी में खाने से ज्यादा भोजन पत्तलों में बर्बाद कर दिया जाता है।तथा शादी-पार्टी के बाद में बचा भोजन भी व्यर्थ में फेंक दिया जाता है।बस एक ही बात कही जाती है कम नहीं पड़ना चाहिए ताकि बेइज्जती न होने पाए।बर्बाद भले ही हो जाए।ऐसा नहीं है खाने वालों से निवेदन है कि जितना खाना खा सको उतना ही भोजन पत्तलों,प्लेटों में निकालना चाहिए।।
        आंकड़े गवाह हैं कि हमारे भारत देश में जितने …

दांतो की पीड़ा की परेशानियां और उनका इलाज

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इलाज ;  दांतो की पीड़ा की परेशानियां और उनका इलाज
हमारे शरीर में दांतों का स्थान अन्य अंगों की तरह बहुत महत्वपूर्ण तो नहीं है फिर भी यह शरीर का अभिन्न अंग है छोटे बच्चे युवा किशोर जवान और वृद्ध सभी इन परेशानियों से कभी न कभी परेशान होते ही हैं हमसभी जानते हैं कि दांतों का मुख्य कार्य मुंह में ले जाए गए भोजन कोपीसना और कुचलकर लुग्दीबनाना होता है | दांतो की कोई भी परेशानी होने पर जब दांत भोजन को पीसकर लुगदी नहीं बना पाते हैं , तब भोजन खंडित रूप में ही आमाशय में प्रवेश कर जाता है | जिससे भोजन का बहुत बड़ा भाग पच नही पाता है | भोजन का ठीक-ढंग से पाचन न हो पाने पर शरीर में तरह तरह की परेशानियां तथा बीमारियां होने लगती है | इसलिए दातों के रखरखाव की बहुत ज्यादा आवश्यकता है | इसीलिए दांतों की देखभाल आदमी की अनिवार्य आवष्यकताओंके अंतर्गत आती है
दांत क्यों गिरते हैं
दंत रोग विशेषज्ञों के अनुसार 60 वर्ष की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते लगभग 80% महिलाओं के तथा लगभग 70% पुरुषों के दांत गिरने शुरू हो जाते हैं | इसके अलावा अगर आप पाश्चात्य देशों के बजाय , पूर्व दिशा में नि…

प्रतियोगी परीक्षाओं मे प्रथम स्थान पर पुरुष

helpsir.blogspot.inआदरणीय सम्पादक जी सादर प्रणाम।         मा०शि०प०उ०प्र०बोर्ड प्रयागराज की हाई स्कूल और इण्टर मीडिएट की बोर्ड परीक्षाओं में अक्सर लड़कियों का जादू सिर चढ़कर बोलता है।अर्थात प्रथम स्थान पर हमेशा से ही लड़कियों का नाम होता चला आ रहा है।इसका एक सबसे बड़ा कारण यह भी माना जाता रहा है कि लड़कियों का परीक्षा सेन्टर हमेशा स्थाई रहता है जबकि लड़कों को दूसरे सेन्टर पर परीक्षा देने जाता पड़ता है।       मेरा यह मानना कतई नहीं है कि लड़कियों में प्रतिभाओं की कमी होती है।बल्कि स्थाई सेन्टर जाना पहचाना होता है तथा स्थाई सेन्टर पर परीक्षा देने के कारण मानसिक द्वंद्व अपेक्षाकृत कम होता है।जबकि लड़कों को इसके विपरीत अनजाने माहौल में परीक्षा देने के कारण मानसिक तनाव अधिक होता है।जिसके कारण परीक्षा देने में लड़कियों की अपेक्षा कम सहूलियत होती है।          यही  कारण है कि हाईस्कूल, इण्टर मीडिएट परीक्षा में लड़कियाँ लड़कों से बाजी मार ले जाती हैं।नीट जैसी राष्ट्रीय स्तर पर प्रतियोगी परीक्षाओं में लड़के ही प्रथम स्थान पर होते हैं।असली प्रतिभा का प्रदर्शन इन राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षाओं में ही देखने को म…