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विलुप्त होते पशु पक्षी

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आदरणीय सम्पादक जी                             सादर प्रणाम
       जब से गाँवों में छप्पर तथा धन्नी के मकान खत्म हो गए तबसे घरेलू पक्षी गौरैया घरों से गायब हो गई है।कभी भोर होते ही चिड़ियों की चहचहाहट सबसे पहले सुनाई देती थी।अब पक्षियों के कलरव गान सुनने को कान तरस रहे हैं।जब पक्षियों को अपना घर अर्थात घोसला बनाने के लिए उपयुक्त जगह ही नहीं है तो बिना घर के आखिर रहे तो कैसे रहे।पक्के सीमेंट, फर्श ,प्लास्टर वाले घर आदमियों के रहने के लिए तो उपयुक्त होते हैं।लेकिन पक्षियों के घोसला बनाने के लिए सर्वथा अनुपयुक्त होते हैं।
       पहले गाँव, देहातों में खेतों के आसपास बाग बगीचे खूब हुआ करते थे।जिनमें परिन्दे अपने परिवार सहित रहा करते थे।जंगली जानवर भी अपने लुकने-छिपने के स्थान खोजकर रहा करते थे।
       अब हिरन,खरगोश, सियार,भेड़िया शायद ही कभी किसी को नजर आते हों।जंगल-बाग कटकर खेत बन चुके हैं।गन्ने की फसल,अरहर की फसल से किसान किनारा करते जा रहे हैं।खेतों तक पक्की सड़कें बनती जा रही हैं।तो आखिर पशु-पक्षी रहें तो कहाँ रहें।विकास तो हो रहा है।साथ-साथ पशु-पक्षियों का विनास भी हो …
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बिखरा साम्राज्य अक्षम नेतृत्व

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आदरणीय सम्पादक जी
                          सादर प्रणाम

         कभी कांग्रेस के सामने बड़े-बड़ो की चुनाव में जमानतें जब्त हो जाया करती थी।1951--1984 तक कांग्रेस का भारतीय राजनीति में स्वर्णिम युग कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।इसमे भी डी.आई.आर.मीसा अर्थात इमरजेंसी के काले अध्याय को हटा दिया जाय तो सब स्वर्णिम ही कहा जाएगा।        इन्दिरा गांधी का कुशल नेतृत्व और कुशल रणनीतिक क्षमता के कारण ही ढ़ाई साल में ही प्रचंड बहुमत से जीती जनता पार्टी सरकार को ढ़ाई साल में ही घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया।और फिर विशाल बहुमत से कांग्रेस सरकार गठित कर दी थी।अगर सेनापति ही कमजोर होता है तो सैनिक लूट-पाट करने ही लगते हैं।यहीं हाल राजीव गांधी जी के शासन काल में शुरू हो गया।
        राजीव गांधी राजनीति के चतुर खिलाड़ी नहीं थे।चापलूसों,धोखेबाजों नें यहीं से घोटालों की नींव रखना शुरू कर दिया।इसके बाद कांग्रेस के शासन काल को यदि घोटालों की सरकार कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
          यही कारण है कि लगातार कांग्रेस की नेतृत्व क्षमता कमजोर होती गई और घोटालों, लूट-पाट का दौर बढ़ता गया।अ…

गुम होते संस्कार

helpsir.blogspot.comआदरणीय सम्पादक जी
                             सादर प्रणाम

       हमारे यहाँ ज्ञानी, मनीषी पूर्वजों ने मातृ-पितृ देवो भव,अथिति देवो भव,का संस्कार दिया था।हमारे यहाँ के संस्कार विश्व के सर्वश्रेष्ठ संस्कार माने जाते थे।पर अब टी.वी.,मोबाइल, कम्प्यूटर, नेट के सम्पर्क के कारण नई पीढ़ी पश्चिमी सभ्यता तथा पश्चिमी खान-पान की ओर ज्यादा अग्रसर हो रही है।
       आज के माहौल मे जहाँ किशोरों, अल्प वयस्कों में बुजुर्गों, माता-पिता का मान-सम्मान घटा है।वहीं किशोरियों, नवयुवतियों में अमर्यादित आचरण यथा-घर से प्रेमी संग भाग जाना,विवाह पूर्व शारीरिक सम्बंध बनाना,अंग प्रदर्शन आदि कुरीतियां बढ़ी है।वाइन, सिगरेट पीने में भी कोई संकोच नहीं है।नारी का लज्जा, मर्यादा ही सर्वोत्तम गहना होता है।नवयुवक और नवयुवतियों में वाइन, सिगरेट का नशा का शौक कुछ ज्यादा ही बढ़ा है।     भारत और भारतीयता हमारे देश के जन जन के खून में रची बसी है।परन्तु आज न जाने क्या हो गया है कि हम अपने सर्वोत्तम संस्कारों को छोड़कर घटिया खान-पान,घटिया संस्कृति और घटिया संस्कारों को अपनाते जा रहें है।तामसी भोजन के ही कारण ता…

बेमेल सुमेल भोजन

helpsir.blogspot.comआदरणीय सम्पादक जी
                              सादर प्रणाम

       इसमें कोई संदेह नहीं कि हमारे पूर्वज पढ़़े-लिखे,ज्ञानी-ध्यानीऔर विश्व में ख्याति लब्ध थे।जब सारी दुनिया निरक्षर थी तब हमारे यहाँ वेद लिखे जाते थे।हमारे सुयोग्य ज्ञानियों नें खान-पान की सुमेल,बेमेल भोजन की विशद व्याख्या की है।        इस समय तनाव ही अधिकतर बीमारियों की जड़ है।शिशु से लेकर वृद्ध जन तक सब तनाव की ही जिन्दगी जी रहे हैं।तनाव के कारण ही अपराध और आत्महत्या की घटनाओं में खासी वृद्धि देखी जा रही है।बीमार और बीमारियों की संख्या बढ़ी है।जिसका एक बड़ा कारण सुमेल-बेमेल भोजन के कारण ही है।       हम अपने पथ-प्रदर्शक मनीषी, ज्ञानी-ध्यानी पूर्वजों की सलाह को अनदेखी कर पश्चिमी सभ्यता के भोजन की ओर आकर्षित हो रहे हैं।जबकि हमारे ज्ञानियों, मनीषियों ने भारत की जलवायु के अनुसार स्वादिष्ट और सेहत से भरपूर खाद्य पदार्थों को खाने-पीने की सलाह दी है।सुमेल-बेमेल भोजन की भी व्याख्या की है।जैसे------हल्दी और दही साथ-साथ नहीं खाना चाहिए।इससे पाण्डु रोग पीलिया का खतरा होता है।शहद और घी अलग-अलग दोनों अमृत तुल्य हैं।ले…

दीदी की दीदीगीरी

helpsir.blogspot.comआदरणीय सम्पादक जी
                            सादर प्रणाम        बंगाल कभी जादू-टोने और काला जादू के लिए मशहूर था।आज बंगाल दीदी "ममता बनर्जी"की दीदीगीरी के लिए जाना जाता है।आजादी के बाद तो सभी सीटों पर कांग्रेस का ही शासन हुआ करता था।फिर बंगाल पर बामपंथियों की पकड़ मजबूत हुई।         राजीव गांधी जी की हत्या के बाद कांग्रेस की बागडोर श्रीमती सोनिया गांधी जी ने संभाली।लेकिन विदेशी महिला कहकर श्री शरद पवार जी,ममता बनर्जी, पंडित सुखराम जी कांग्रेस पार्टी से अलग होकर अपनी-अपनी पार्टी बनाई थी।तबसे ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस बंगाल में लगातार संघर्ष करते हुए सत्ता पर अब पूर्णरूपेण काबिज हो पाई है।
       अब दीदी की बंगाल में तूती बोलती है।दीदी का तृणमूल युवा संगठन तथा तृणमूल छात्र संगठन कुछ अधिक ही मजबूत बनकर उभरा है।लोकसभा चुनाव 2019 में दीदी ने सार्वजनिक मंच से बदला लेने की घोषणा कर डाली।भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह के रोड शो के दौरान बर्बर लाठीचार्ज करके भाजपा के कई कार्यकर्ताओं को बुरी तरह घायल कर डाला।बाद में दीदी नें मोदीजी को भी जेल भ…

सत्ता सुन्दरी के लिए खूनखराबा

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                             सादर प्रणाम        सत्ता, सल्तनत, तख्त-ओ-ताज के लिए अति प्राचीन समय से ही खून-खराबा, कत्ल-ओ-गारत होते चले आ रहे हैं।राजमद में चूर होकर अनेकों, राजाओं, सुल्तानों ,सम्राटों, नें गैरों-अपनों के खून करके ही राजतिलक करवाए हैं।इसका एक बहुत लम्बा इतिहास रहा है।इतिहास में अनेकों किस्से-कहानियां भरी पड़ी हैं।इस धरती पर एक से बढ़कर एक राजा,सुभट,सम्राट,महाराजा वीर ,बहादुर हुए और धरती को अपनों-गैरों के खून से लाल किए है।       अंग्रेजों के जाने बाद भारत में लोकतंत्र का राज कायम हुआ।लेकिन पहले प्रधानमंत्री श्री जवाहर लाल नेहरू ने ही लोकतंत्र की हत्या कर प्रधानमंत्री पद पर आसीन हुए।सरदार वल्लभ भाई पटेल को 7 वोट तथा जवाहर लाल नेहरू जी को 1 वोट मिला था।लेकिन मोहनदास करमचंद गांधी जी की कृपा से तथा अपने धन-बल पर आखिरकार प्रधानमंत्री पद पर आसीन होने में श्री जवाहरलाल नेहरु जी ही सफल हुए थे।तब से अब तक कभी-कभी लोकतंत्र की हत्या या लोकतंत्र के लहूलुहान होने के समाचार मिलते ही रहे हैं।        ताजा घटना क्रम पर नजर डालें तो दि०14-05-2019 को उ०…

राजनेताओं की गिरती साख

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आदरणीय सम्पादक जी
                               सादर प्रणाम     एक समय था जबराजनीति में राजनेता एक दूसरे का आदर सम्मान करते थे, भले ही वह विभिन्न विचारधारा और विभिन्न दलों से सम्बंधित होते थे।अटल बिहारी वाजपेयी जी इसके सशक्त हस्ताक्षर थे।जिनका सम्मान सभी दलों के सांसद किया करते थे।         चौधरी चरण सिंह जी भी श्रीमती इंदिरा गांधी जी के धुर विरोधी होने के बावजूद श्रीमती इंदिरा गांधी जी के सुख-दुख में सदैव साथ खड़े नजर आते थे।प्रधानमंत्री पद की अपनी एक अलग गरिमा होती है।गुजरे जमाने के राजनेता कभी भी इस पद की गरिमा को ठेस पहुंचाने का काम नहीं करते थे।कभी भी एकदूसरे पर व्यक्ति गत टिप्पणी नहीं किया करते थे।वैचारिक और राजनीतिक भेद अपनी जगह पर थे।लेकिन निजी जिंदगी में शत्रुता के भाव का सर्वथा अभाव था।       आज राजनीति और राजनेताओं दोनों का स्तर काफी नीचे गिर गया है।एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए काफी नीचे गिर चुके हैं।प्रधानमंत्री पद की गरिमा भी तार-तार हो चुकी है।"चौकीदार चोर है।"जैसे अमर्यादित और बिगड़े बोल इसके सशक्त उदाहरण हैं।        राजनेताओं की जबानें अक…