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भयानक कर्कट रोग कैंसर

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भयानक कर्कट रोग कैंसर
इस संसार में प्राणलेवा रोगों में अनेक रोगों का नाम लिया जा सकता है जैसे HIV पॉजिटिव होना , डेंगू , ब्लडप्रेशर , चेचक और कैंसर आदि | इन सभी मारक रोगों में कैंसर का महत्वपूर्ण स्थान है | यह एक दुष्ट रोग है , तथा जिस भी प्राणी को यह रोग हो जाता है , उसे अपने जीवन का अंत निकट दिखाई पड़ने लगता है | क्योंकि अभी तक पूर्ण रूप से इस के सफल और सटीक इलाज की खोज नहीं हो पाई है | केवल आयुर्वेद ही इसकी सफल चिकित्सा करने में पूरी कामयाबी हासिल कर सका है | आज हम इस रोग के बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे , और उसके सफल इलाज का वर्णन भी करेंगे |
कारण
आयुर्वेद में कैंसर को बड़े ही सूक्ष्म रूप में इसका सफल अध्ययन किया है | आयुर्वेद में कैंसर को रक्तार्बुद के नाम से जाना जाता है | पहले इसे असाध्य रोग माना जाता था | इस रोग की सही जानकारी होने पर रोगी परेशान होकर इस संसार से जाने की तैयारी करने की सोचने लगता है | प्राचीन समय में इस रोग के रोगी '' न '' के बराबर मिलते थे , परंतु आजकल इसका उग्र रूप सामने आ रहा है | इसका प्रमुख कारण है, लोगों का ''प्रकृति के विपरीत '' आचरण करना , तथा शरीर में हो रहे अस्वाभाविक परिवर्तनों पर ध्यान न देना है | रोग के आरंभ में शरीर में एक साधारण सी गांठ होती है | जिस पर लोग ध्यान नहीं देते हैं | बाद में इसका नजरंदाज करना उसे भारी पड़ जाता है | लंबे समय के उपरांत जब इस गांठ का परीक्षण किया जाता है तब उस व्यक्ति ने का पता चलता है कि उसे कैंसर रोग चुका है |
कैंसर के प्रकार
इस रोग के परीक्षण हेतु आधुनिक चिकित्सक सूक्ष्मदर्शी यंत्र द्वारा या फिर अन्य रासायनिक परीक्षणों द्वारा इस रोग की जानकारी प्राप्त करते हैं | उन्होंने कैंसर को दो प्रकारों में बांटा है | पहली प्रकार के कैंसर को बेनाइन या निर्दोष कैंसर कहते हैं , तथा दूसरे प्रकार के कैंसर को मैंलिगनेंट या घातक कैंसर कहते हैं | इनमें से पहले प्रकार के रोगियों की चिकित्सा करने पर सफलता प्राप्त हो जाती है | लेकिन दूसरे प्रकार के रोगी असाध्य होते हैं | इसप्रकार के रोगियों के उपचार का तरीका भी जटिल होता है | इस रोग में चिकित्सक को पहले यह पता लगाना पड़ता है कि रोग किस स्तर पर है | चिकित्सा से प्रारंभिक स्तर का रोगी ठीक हो सकता है , परंतु दूसरे और तीसरे प्रकार के रोगी को ठीक करना लगभग असंभव होता है |
लक्षण
कैंसर के लक्षणों के आधार पर ही प्रारंभिक अवस्था में यह जाना जाता है कि रोगी के शरीर में कहीं पर गाँठ है या नहीं | यदि शरीर में कोई गांठ है जो ज्यादा समय से है और ठीक नहीं हो रही है तो कैंसर हो सकता है | इसके अलावा रोगी में रक्त कणिकाओं की कमी , दुर्बलता की वृद्धि तथा बेचैनी की वृद्धि भी परिलक्षित होती है | इस रोग में व्यक्ति के वातावरणीय कारक और दूषित रहन-सहन का परिवेश भी जिम्मेदार है | इसीलिए हर स्थान पर इसरोग के एक जैसे लक्षण पाया जाना नहीं देखा गया है | प्रारम्भ में इस रोग में प्रमुख रुप से जीभ , स्तन , तालु , दांत , नाक , आंख , अन्ननलिका , पेट , स्त्री जननेंद्रिय , पैर की उंगलियों और चमड़ी आदि प्रभावित होती है | आयुर्वेद में इस रोग की उत्पत्ति का कारण मिथ्या आहार-विहार तथा प्रज्ञापराध को माना है | धूम्रपान , मदिरापान और तरह-तरह के नशे भी इसका कारण हो सकते हैं | इसलिए रोगी को इनका उपयोग तुरंत ही बंद कर देना चाहिए |
अनुभूत और परीक्षित इलाज
इस रोग के रोगी को चाहिए कि वह प्रतिदिन देसी गाय का मूत्र इकट्ठा करें | इस मूत्र को किसी 8 परत वाले सूती कपड़े से छानकर साफ करें | इसके बाद इसकी लगभग एक कप मात्रा प्रातः पी लिया करे | इसी प्रकार शाम को भी एक कप पी लिया करें | इस बात को गांठ बांध लें गाय का मूत्र कोई ऐसी वैसी चीज नहीं है | यह एक चमत्कारिक औषधि भी है | कैंसर पीड़ित व्यक्ति के शरीर में एक तत्व की विशेष रुप से कमी हो जाती है | इस तत्व को करक्यूमिन कहा जाता है | जिसकी प्रचुर मात्रा गाय के मूत्र में मौजूद होती है , जो कैंसर रोग की जड़ों को ही नष्ट कर देती है | करक्यूमिन तत्व केवल गाय के मूत्र में या फिर हल्दी में ही पाया जाता है | इसलिए गाय का मूत्र पीने में बिल्कुल हिचक न करें | लोग तो इससे भी बेकार जायके वाली और दुर्गंध तथा सड़ांध से परिपूर्ण मदिरा को केवल मनोरंजन के लिए पी जाते हैं | पर आप तो चिकित्सा कर रहे हैं , आपको तो भयंकर जानलेवा बीमारी से छुटकारा पाना है , फिर ऐसे आपको पीने में क्या कष्ट है | थोड़ा सा धैर्य धारण करें , मन की गंदगी साफ करें , और इसे जीवन अमृत समझ कर पी लें | यह औषधि तो आप का कष्ट हरण करने वाली है | इसलिए कोई झिझक , बिना किसी हीलहुज्जत के इसका सेवन कर ही लें | इस हेतु किसी प्रकार का विचार बिल्कुल ही न करें | आप पूरा विश्वास करें कि आपको इस औषधि से ठीक होना ही है | कैंसर आप का कुछ नहीं बिगाड़ सकता है | उसे तो ठीक होना ही पड़ेगा | हाँ अगर आपको शरीर को गोमूत्र से ज्यादा प्यार करते हैं तो इसे बिलकुल ही न पियें और किसी भी मरने के लिए तैयार रहें , क्योंकि मौत तो आपका इन्तजार कर ही रही है | अपने जीवन ,मरण का फैसला तो आपको ही करना है | यह एक ऐसा नुस्खा है जिसे अनेकों लोगों पर अपनाया जा चुका है तथा इसके सफल परिणाम भी मिले हैं |🔺

🔻 पूरक चिकित्सा
उपरोक्त चिकित्सा से आपका ठीक होने की गारंटी लेता है | पर यह औषधि करने के साथ ही रोगी को चाहिए कि वह रात में सोते समय 7 से 10 ग्राम पिसी हल्दी का चूर्ण मुंह में डालकर धीरे-धीरे उसे पेट के अंदर करता जाए | इस प्रक्रिया में उसे लगभग 15 मिनट लगाना चाहिए | आप चाहे तो प्रारंभ हमें इसकी कम मात्रा लेकर के करके इसे खाने का अभ्यास करें , बाद में पूरी मात्रा का सेवन करते रहें | [ यह आपकी इच्छा पर निर्भर करता है की आप पूरक इलाज करें अथवा न करे , तो आप केवल से ही हो जायेंगे ] अगर आपको मृत्यु के मुख से बचना है तथा कैंसर पर विजय पानी है तो , आपको यह करना ही होगा इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं है | यदि आप पूरी लगन और श्रद्धा के साथ इस औषधि का प्रयोग करते हैं तो आप का कैंसर पर विजय प्राप्त करना निश्चित है |
जय आयुर्वेद
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