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[ 1 ] धर्म ; मानवप्रकृति के तीन गुण

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धर्म ; मानवप्रकृति के तीन गुण

संसार में जन्म लेने वाले प्रत्येक प्राणी के माता-पिता तो अवश्य होते हैं | परंतु धार्मिक विचारकों के अनुसार उनके माता-पिता , जगत जननी और परमपिता परमेश्वर ही होते हैं | इस संबंध में यह तो सभी जानते हैं कि ,जिस प्रकार इंसान का पुत्र इंसान ही बनता है , राक्षस नहीं | इसी प्रकार शेर का बच्चा शेर ही होता है , बकरी नहीं | क्योंकि उनमें उन्हीं का अंश समाया होता है | ठीक इसी प्रकार जब दुनिया के समस्त प्राणी परमपिता परमेश्वर की संतान हैं , तब तो इस संसार के प्रत्येक प्राणी में ईश्वर का अंश विद्यमान होना चाहिए | आत्मा का अंशरूप होने के कारण , सभी में परमात्मा से एकाकार होने की क्षमता व संभावना होती है | क्योंकि मनुष्य की जीवात्मा, आत्मा की उत्तराधिकारी है , इसलिए उससे प्रेम रखने वाला दिव्यता के शिखर पर न पहुंचे , ऐसा कोई कारण नजर नहीं आता है | यह जरूर है कि , संसार के मायाजाल में फँसे रहने के कारण मानव इस शाश्वत सत्य को न समझने की भूल कर जाता है , और स्वयं को मरणधर्मा शरीर मानने लगता है |

जीव आत्मा अविनाशी है

मानव शरीर में प्रविष्ट अविनाशी जीवात्मा को नाशवान देह से बांधने का , या यूं कहें कि उसके प्रति आसक्ति पैदा करने का कार्य प्रकृति के तीन गुण ही करते हैं | जिन्हें हम सत , रज और तम के नाम से जानते हैं | इसे इस प्रकार से भी समझा जा सकता है | कि यदि जीवात्मा सदा , नित्य , शुद्ध और अविनाशी है तो हमारे मन मे इस देह के प्रति आकर्षण , उसके छूट जाने का भय -- कब और कैसे प्रकट हो जाता है | इस जिज्ञासा का उत्तर यह है कि , ऐसा इसलिए होता है कि हम स्वयं को, तथा अपने अस्तित्व को--प्रकृति के गुणों द्वारा या प्रकृति के गुणों के माध्यम से परिभाषित हुआ मानने लगते हैं | परिणाम स्वरुप हम अपने सत्य , सास्वत और अविनाशी स्वरूप को भूलकर तथा प्रकृति के गुणों में बंधकर अपनी पहचान एक शरीर के रूप में मान लेते हैं | यही कारण है कि ऐसे मे ही शरीर के सुख-दुख , आसक्ति- मोह , क्रोध व पीड़ा हमको हमारे अपने लगने लगते हैं | जबकि इसके विपरीत बंधनों से मुक्त जीवआत्मा के लिए तो यह एक आभास के अलावा कुछ और है ही नहीं |

प्रकृति के गुण

प्रकृति के तीनों ही गुण बहुत ही महत्वपूर्ण है | जिन्हें हम सत , रज और तम के नाम से जानते हैं | इनकी अपनी निर्धारित विशेषताएं हैं , तथा इनका स्वभाव ही इनका गुण है | भारतीय चिंतनकारों ने इनका सदा ही इनका वर्गीकरण , इनके गुणात्मक आधार पर किया है , तथा उसी क्रम में प्रकृति के यह 3 गुण भी वर्गीकृत किए गए हैं | चिंतनकारों के अनुसार निष्क्रियता का ठहराव वाले प्रकृति के गुण को '' तम '' कहा गया है , तथा कामना और गति की सक्रियता वाली प्रकृति के गुण को'' रज '' , और सबसे अंत में संतुलन तथा साम्यावस्था की प्रकृति वाले के गुण को ''सत '' नाम से वर्गीकृत किया गया है | प्रकृति के यह गुण जीवात्मा मे -- मै शरीर हूं , शरीर की कामनाएं और वासनाएं मेरी है , इस प्रकार की देहाशक्ति पैदा कर देती है कि इस से प्रभावित देहाशक्ति ही जीवात्मा के बारंबार जन्म लेने और मरने का कारण बनती है | जबकि सत्य यह है कि यह गुण जीव को नहीं बांधते , वरन हमारी उनके प्रति आसक्ति ही हमारे बंधन का कारण बनती है |

गुणों का कार्यक्षेत्र

प्रकृति क़े इन तीनों गुणों का कार्यक्षेत्र भी हमारे अस्तित्व या हमारे व्यक्तित्व के तीन भिन्न-भिन्न तललों पर होता है | जिनका विवरण इस प्रकार है

प्रकृति के इन गुणों का प्रभाव हमारा यह नश्वर शरीर , जिसे हम स्थूलशरीर , के रूप में देखते या दिखाई देते हैं , पर अपना प्रभाव डालता है |

'' तम '' नाम के प्रकृति का यह गुण आलस्य , आशक्ति , निष्क्रियता , जड़ता या टकराव के कारण होता है

|'' रज '' का प्रभाव क्षेत्र मानव का मन है | मानव के मन में कामनाओं , वासनाओं , आकांक्षाओं , महत्वाकांक्षाओं और तृष्णाओं का निवास हो जाता है | ऐसी स्थिति को प्राप्त मानव पर प्रकृति का रजोगुण परिलक्षित होने लगता है |

इसी तरह '' सत् '' का प्रभाव क्षेत्र भावनाओं पर दृष्टिगोचर होता है | प्रकृति का गुण मानव की उपरोक्त प्रकृतियों मे संतुलन , साम्यता और शांति के रूप में अपनी उपस्थिति के अनुभव का एहसास कराता है |


सीधे और सरल शब्दों में जाना जाए तो '' तम '' निराशा और दुख का अनुभव कराता है | तथा '' रज '' आशा का और सुख का अनुभव कराता है | जबकि '' सत् '' इनके बीच मे संतुलन बनाता है | यह तीनों ही गुण , जीवात्मा का बंधन तैयार करते हैं | इन तीनों के बिना जीवआत्मा शरीर में रह ही नहीं सकती | इसका कारण है कि इनसे पार जाते ही , त्रिगुणातीत होते ही , जीवात्मा सभी प्रकार के बंधनों से मुक्त हो जाती है , और अपने मूल रूप में आकर , मूल अवस्था को प्राप्त कर लेती है |

इति श्री


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