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माता के समान है परमात्मा

हमारे धर्म ग्रंथों के अनुसार आत्मा अजर अमर है। आत्मा को किसी भी प्रकार मिटाया नहीं जा सकता है। इस संबंध में आज का विचारणीय विषय है कि , आत्मा और परमात्मा के बीच क्या संबंध है। हमारी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जीवात्मा और परमात्मा का संबंध एक बेटे और मां की तरह का होता है। जिस प्रकार से एक पुत्र अपनी मां की कोख में पालन पोषण और विकास पाता है। बिल्कुल इसी तरह हमारी जीवात्मा का अंकुरण , विकास और उसका अस्तित्व सभी कुछ परमात्मा से ही तो होता है। प्रत्येक जीवआत्मा का हर रूप उसी ईश्वर के सागर रूपी लहरों की और तरंगों की तरह होता है। परमात्मा के प्रभाव से ही प्राणी में निहित आत्मा पल्लवित , पुष्पित और खिलती रहती है |

संबंधों में प्रगाढ़ता

जिस प्रकार से इस संसार की हर माता का उसके बेटे के साथ गहरा संबंध होता है। ठीक उसी प्रकार प्राणी की जीवआत्मा का संबंध भी परमात्मा से होता है। विराट पुरुष के रुप में परमात्मा ही हमारी मां के समान मानी गई है। जिस प्रकार से मां का अपने पुत्र के साथ भावनात्मक संबंध होता है , ठीक उसी प्रकार जीवात्मा का संबंध भी परमात्मा से ही होता है।

भावना की सघनता और व्यापकता


भावना की सघनता और व्यापकता ही ममता का रूप धारण करती है। जिसप्रकार एक मां के हृदयस्थल में उमड़ी हुई ममता , पुत्र पर सावन की घटा बनकर निरंतर प्रेम , घनिष्ठता और लगाव का संबंध मजबूत करती रहती है। ठीक इसीप्रकार परमात्मा की यह ममता , जीवात्मा पर सदैव अपना प्रेम लुटाने के लिए आतुर रहता हैं। इसी से जीवात्मा को सर्वांगीण रूप से पोषण मिलता रहता है। जिससे उसका अनवरत विकास होता रहता है। परमात्मा का यह प्रेम कभी नहीं चुकता बल्कि जीवात्मा को सतत मिलता ही रहता है।

सतत प्यार और पोषण लुटाते रहना और भावना के संबंध

मां और बेटे के बीच उपरोक्त गुण सदैव अटूट ही रहते हैं। यही कारण है कि दोनों मे जैविक संबंध सदा ही मजबूत बने रहते हैं। ठीक इसी के अनुरूप परमात्मा और जीवात्मा के संबंध भी एक दूसरे से एक मजबूत जोड़ से जुड़े रहते हैं। यदि परमात्मा को लगता है कि, उसने जीवात्मा को जो सब कुछ प्रदान किया ही है। फिर भी यदि कुछ देना शेष होता है , तो वह भी बिना किसी दुराव या छिपाव के उसे भी देने को सदैव तैयार रहता है। अगर संबंधों में भावना की न्यूनता हो जाए , तब थोड़ा सा भी कष्ट परमात्मा को असहनीय प्रतीत होने लगता है। जिसके यथोचित निराकरण के लिए वह , हर प्रकार के कष्टों को स्वयं अपने ऊपर लेकर , जीवात्मा को सुखी रखने का प्रयास करता है।

अद्भुत अनुभूति

जब कोई मां अपने बच्चे को जन्म देती है। उस समय उसे एक अद्भुत अनुभूति होती है। उसे लगता है कि जैसे उसके शरीर का कुछ अंश बाहर आ गया हो। ठीक इसी प्रकार जीवात्मा जब किसी शरीर में प्रवेश कर जाती है तब परमात्मा को एक अद्भुत अनुभूति होती है। अनुभूत के यह सूक्ष्म तंतु और सूक्ष्म संवेदनाएं एक दूसरे को आपस मे मजबूती के साथ जोड़ें रहती हैं। इस पर काल , स्थान , गति और स्थिति का कोई भी प्रभाव नहीं पड़ता है। क्योंकि इसमें भावनाओं और सम्वेदनाओं की गहरी सघनता विद्यमान होती है। दोनों के बीच कोई विभेदक और विभाजक दीवार खड़ी नहीं की जा सकती है , क्योंकि दोनों ही अलग अलग न होकर एक ही होते हैं। ऐसे में दोनों के बीच भेद करना असंभव हो जाता है।

परमात्मा हृदय हीन नहीं

जिस प्रकार से प्रत्येक प्राणी को अपने जीवन में सुविधा और आनंद का भरपूर मौका मिलता है। ठीक इसी प्रकार परमात्मा भी जीवात्मा को यह अवसर प्रदान करती है। इसमें यदि कहीं कोई भी अवरोध उत्पन्न होता है तो , उसका कारण हम स्वयं ही हैं। हमारे द्वारा ही कुछ गड़बड़ी कर दी जाती है , जिसके कारण जीवन में दुख , कष्ट और परेशानियां आने लगती है

परंतु परमात्मा के अंदरहृदयहीनता होती ही नहीं है , इसीलिए जब हमारे अंदर विद्यमान जीवात्मा उसे माता - माता कह कर , परमात्मा को पुकारती है। तब परमात्मा उसके कष्ट के हरण के लिए संवेदित होकर उसकी पीड़ा दूर करने के लिए प्रयासरत हो जाता है। जिस प्रकार से कष्ट होने पर पुत्र अपनी मां को पुकारता है और माता उसके कष्ट उनके हरण के प्रयास करती है , ठीक उसी प्रकार शरीर में स्थित जीवात्मा जब परमात्मा को पुकार करती है तब वह उसके कष्ट हरने के सभी प्रयास कर , उसका भविष्य सुखमय बना देता है।

इति श्री

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