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इलाज ; मुंह का लकवा [1 /1 ]

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इलाज ; मुंह का लकवा [1 /1 ]

हमारे शरीर में अनेकों प्रकार की गंभीर से गंभीरतम बीमारियां हो सकती है , तथा हो भी जाती है |ऐसी ही गंभीर बीमारियों मुंह का लकवा भी एक बीमारी है। इस रोग से पीड़ित व्यक्ति का मुंह टेढ़ा हो जाता है। जिसके कारण उसका चेहरा कुरूप दिखाई पड़ने लगता है। परिणाम स्वरुप आदमी को अपने जीवन में कष्ट और ग्लानि काअनुभव होने लगता है। यह एक ऐसी व्याधि है , जो रोगी को अचानक ही हो जाती है। इस रोग का पता रोगी को पहले से नहीं हो पाता है |
\\रोग के कारण \\
जो लोग हरदम ऊंची आवाज में बात करते हैं , अर्थात जोर जोर से बोलते हैं , जोर जोर से हंसते है या फिर ऐसे लोग जिन्हें जन्भाइयाँ अधिक आती हैं तथा भारी बोझ उठाना पड़ता है , उनको यह रोग आसानी से हो जाता है। ऐसे व्यक्ति सदा कठिन भोजन करते हैं , और ऐसे लोग जिन्हे मजबूरी बस ऊंचे-नीचे स्थान पर विकृत शरीर की स्थिति में सोना पड़ता है। ऐसे लोगों के शरीर की वायु प्रकुपित होकर सिर , मस्तक , नाक होंठ और आंखों पर आ कर रुक जाती है। यह प्रकुपित वायु शरीर के जिस स्थान पर रुक जाती है , उस स्थान को प्रभावित कर विकृत बना देती है। जिसके परिणाम स्वरुप शरीर वह भाग टेढे मेढे हो जाते हैं

\\ रोग के लक्षण \\

जब शरीर में उत्पन्न हुई दूषित वायु प्रकुपित होकर मुंह पर रुक जाती है। उस समय उस व्यक्ति का मुंह टेढ़ा मेढ़ा हो जाता है , इसे ही मुंह का लकवा कहते हैं। इसमें रोगी की गर्दन एक और झुक जाती है , तथा कभी-कभी सिर भी हिलने लगता है। इस लकवे के कारण रोगी की बोलने की शक्ति कमजोर पड़ जाती है , जिसके कारण उसको बोलने में बहुत ही कष्ट होता है। उसके मुंह से सही शब्द नहीं निकल पाते हैं शब्दों के स्पष्ट रूप से ना निकल पाना तथा आंखों में पीड़ा और फड़कन होकर टेढ़ापन भी आ जाता है। इसी प्रकार नाक में भी पीड़ा और टेढ़ापन हो जाता है। शरीर के जिस भाग में यह लकवा हो जाता है उस ओर की गर्दन टेढ़ी हो जाती है , और ठोढ़ी तथा दाँत में पीड़ा होती है।
\\ लकवे काप्रारंभिकक रूप \\
जब किसी व्यक्ति को यह रोग होने वाला होता है , उस समय उसके शरीर में रोमांच होना , कँपकँपी होना , आंखों में मैल आना तथा वायु का ऊपर की ओर चढ़ना शुरू होता है। धीरे-धीरे शरीर की त्वचा में सुन्नता आ जाती है , और वहां पर सुई चुभने जैसी पीड़ा होने लगती है। इसके अलावा रोग की प्रारंभिक स्थिति में ग्रीवा के जिस ओर इसका प्रभाव पड़ता है उस ओर के जबड़े में जकड़न और अकडाहट सी हो जाती है
\\ योग के असाध्य लक्षण \\
इस रोग के असाध्य लक्षणों के बारे में आयुर्वेदाचार्य ने लिखा है , कि रोगी बहुत दुर्बल हो जाता है , उसकी पलकों में गति नहीं हो पाती है , और बोलने की सामर्थ्य भी खत्म हो जाती है। रोग की इस स्थिति को पहुंचा हुआ व्यक्ति चिकित्सा से ठीक नहीं किया जा सकता है। ऐसे रोगी व्यक्तियों के मुंह नाक और आँखों से पानी निकलने लगता है। रोगी के शरीर में हरदम कंपन बना रहता है। अगर ऐसी स्थितियां मिले तो समझ लेना चाहिए कि रोग असाध्य स्थिति को पहुंच चुका है। ऐसे रोगी को इलाज से ठीक कर पाना मुश्किल हो जाता है। इस रोग का ठीक करने का उपाय करें अगर सफलता मिल जाये तो आगे भी चिकित्सा जारी रखें अन्यथा इस को पिछले जन्म का कर्म फल समझकर इसका फल ईश्वर पर छोड़ देना चाहिए।
\\ रोग का रोग के प्रारंभिक उपाय \\
इस रोग का पता लगते ही रोगी को दूध में सोंठ उबाल कर देना प्रारम्भ कर दें , तथा नारियल के तेल को गर्म जल में डालकर नित्य कुल्ले करवाएं। इसके अलावा वायु को प्रदूषित करने वाले भोज्य पदार्थ और कार्य करने बंद कर दें। खट्टे पदार्थों का सेवन तो बिल्कुल ही ना करने दे। इसके अलावा रोगी के शरीर के जिस भाग में लकवा हो , उसे ओर एक जनेऊ इस प्रकार पहना दे। इसके बाद उस जनेऊ में शरीर के लकवे वाले भाग की ओर एक या दो जायफल बांध दें।
\\ औषधीय चिकित्सा \\
रोगी की चिकित्सा के पूर्व किसी पंसारी के यहां से दशमूल काढ़ा को बनाने वाली प्रयुक्त होने वाली दसों औषधियों की 100 ग्राम की मात्रा मे किसी पंसारी की दुकान से खरीद लें। प्रत्येक औषधि 10 - 10 ग्राम की मात्रा में ही लें। इन सभी औषधियों को 1 लीटर पानी उबालना शुरू करें जब पानी की मात्रा 200 ग्राम बचे , तब बर्तन को चूल्हे से उतार कर ठंडा कर करने लगे। जब पानी गुनगुना रह जाए तब इसमें दो चुटकी सेंधानमक और 50 ग्राम अरंड का तेल भी मिला दे। इस औषधि की आधी मात्रा सुबह और आधी मात्रा शाम को रोगी को देना प्रारंभ करें। औषधि रोज बनाएं और रोज भी नई बनाकर ही सेवन करें। इससे 8 या 10 दिन में चाहे जिस प्रकार का लकवा हो , ठीक हो जाता है।
\\ दूसरा उपाय \\
हड़ताल बर्कियः शुद्ध 10 ग्राम तथा काली मिर्च 40 ग्राम ले। अब किसी मजबूत खरल में हड़ताल को बारीक पीसना शुरू करें। इसमें एक-एक काली मिर्च भी डालते जाएं। जब सारी मिर्चें खत्म हो जाएं , उसके बाद भी लगभग 7 घंटे और घुटाई करें। इस बात का ध्यान दें कि जितना ही अधिक घुटने में मेहनत करेंगे , औषधि भी उतनी ही प्रभावशाली बनेगी , तथा उतना ही अधिक लाभ भी करेगी। अब इस औषधि का एक रत्ती चूर्ण 3 ग्रेन रससिन्दूर मिलाकर , किसी मुनक्के के बीज निकालकर , उसमें डालकर रोगी को प्रातः खिला दें। ऐसा ही औषधि का एक मुनक्का शाम को खिलाएं। इस औषधि के सेवन के 1 महीने बाद धीरे-धीरे लाभ मिलना शुरू हो जाएगा , तथा लकवा धीरे धीरे ठीक हो जाएगा। इस औषधि से रोगी के पूरी तरह से ठीक होने की पूरी गारंटी भी है।
उपरोक्त उपाय करके आप अपने रोगी को स्वयं की ठीक कर सकते हैं। चिकित्सा करने से पूर्व प्रत्येक बात को ध्यानपूर्वक पढ़ें , उसके बाद ही चिकित्सा करें , ताकि रोगी को निरोग होने में पूरी सफलता प्राप्त की जा सके।
\\ जय आयुर्वेद \\

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