सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

इलाज ; गुर्दे की पथरी [ 13 ]

Web - 1najar.in
गुर्दे की पथरी
हमारे शरीर का पिछला भाग पीठ कहलाता है | इसके निचले भाग में शरीर के भीतर दोनों ओर सेम के आकार की दो संरचनाएं पाई जाती है , जिन्हें गुर्दा कहा जाता है | गुर्दे शरीर के फिल्टर हैं | यह दोनों ही फिल्टर मूत्र मार्ग में आए हुए दूषित पदार्थों को छानकर अलग करते हैं | लोगों के गुर्दे में जब दूषित पदार्थों काफी मात्रा इकट्ठा होकर एक पिंड बना लेते है | इस प्रकार की बनी हुई संरचनाओं को पथरी कहते हैं | पथरी का स्थान गुर्दे में होता है | इसलिए इन्हें गुर्दे की पथरी कहते हैं | यह बीमारी मूत्र संस्थान से संबंध रखने वाली होती है , और पीड़ित को बहुत ही कष्ट देती जाती है | इस रोग से पीड़ित व्यक्ति रोग से तिलमिलाकर बेहोश भी हो जाता है |
गुर्दे में पथरी होने के कारण
वास्तव में गुर्दे मूत्र से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालते हैं | यदि किसी कारणवश इनकी प्रक्रिया बाधित होती है , उसी समय व्यक्ति इस रोग से पीड़ित हो जाता है | इस रोग में मूत्र के साथ निकलने वाले चूने आदि के रूप में विभिन्न छारीय तत्व , जब किसी कारणों से मूत्र नलिका या मूत्राशय में रुकने लगते हैं | उस समय यह आवांछित पदार्थ वहाँ पर प्रकुपित वायु के प्रभाव में आ जाते हैं | उसके बाद गुर्दे में एकत्र होकर रेत या कंकड़ का रुप होने लगते हैं | प्रारंभ में इनका आकार बहुत ही छोटा होता है | समय के साथ-साथ यह कंकड़ बढते रहते हैं और बड़ा आकार ले लेते हैं | कभी-कभी कई कंकड़ भी बन जाते हैं |
केले द्वारा इलाज
इनकी औषधीय चिकित्सा करने के कई तरीके हैं | इस परेशानी में केले की जड़ का प्रयोग होता है | रोगी को प्रातः काल जड़ की एक तोला मात्रा सेवन कराई जाती है | उसके बाद पूरे दिन उसे भोजन में गेहूं की रोटी और कुलथी का साग दिया जाता है | इसके अलावा रोगी को अन्य कुछ खाने को नहीं दिया जाता है | पूरा दिन बीत जाने के बाद रोगी को सारी रात जागरण करना पड़ता है | रोगी की रात्रि जागरण में कोई लापरवाही नहीं होनी चाहिए | यदि रोगी जरा सी भी झपकी ले लेता है , तब उसे इस रोग से छुटकारा नहीं मिल पाता है | अगले दिन प्रातः से रोगी अपनी नियमित दिनचर्या शुरू कर सकता है | फिर भी उसे 1 सप्ताह तक खाने में रोटी के साथ कुलथी का साग ही दिया जाना चाहिए | इसके अलावा अब उसे खाने में दाल और चावल भी दिया जा सकता है |
पूरक चिकित्सा
गुर्दे की पथरी के रोगी को जिस दिन से दवा सेवन कराई जानी होती है |उसके 1 दिन पूर्व से ही उसे यव का पानी या नारियल का पानी या गन्ने का रस अथवा कुल्थी का पानी में से किसी एक का सेवन करना आवश्यक होता है | इस पानी को रोगी के दवा के सेवन से 1 दिन पूर्व और दवा सेवन की पश्चात तक दिन तक आवश्यक रूप में दिया जाना चाहिए | इसके बाद अगर उपलब्ध हो तो यह पानी पिलाना 7 दिन तक जारी रखें फिर भी 3 दिन तक अवश्य पिलाएं |
जवाखार से इलाज

गुर्दे की पथरी के लिए प्रयुक्त होने वाली औषधियों में जवाखार का महत्वपूर्ण स्थान है | जवाखार को आसानी से पंसारी के यहां से खरीदा जा सकता है | जवाखार की 1 ग्राम की मात्रा प्रातः पानी के साथ लेनी होती है | इसी प्रकार एक ग्राम की मात्रा पानी के साथ ही शाम को भी लेनी होती है | यदि इसी के साथ के साथ गोखरू का चूर्ण 2 ग्राम और पत्थरचट का चूर्ण 1 ग्राम की मात्रा में मिलाकर दिन में पीड़ित को दो बार कुनकुने पानी से पिलाते हैं , तो रोगी को अपेक्षित लाभ मिलता है | इस दवा को रोगी को लगभग 3 महीने तक करना पड़ता है |
अंत में
इन दोनों प्रकार की चिकित्साओं में किसी एक का प्रयोग करने से मूत्राशय अर्थात गुर्दे की पथरी टुकड़े टुकड़े होकर मूत्र मार्ग से बाहर निकल जाती है | क्योंकि यह पथरी मूत्रनलिका के रास्ते से ही बाहर निकलती हैं , इसलिए पेशाब करते समय जलन या पीड़ा भी हो सकती है | कभी-कभी तो खून भी आ जाता है या खून मिला हुआ पेशाब होता है | परंतु इससे घबराना नहीं चाहिए | क्योंकि यह भी चिकित्सा का ही एक हिस्सा है || इस बात को सदैव याद रखें कि मूत्रनलिका से पथरी परेशानी के साथ ही नीचे उतरती है | पथरी उतरने की यह क्रिया कष्टदाई होती है | इससे घबराने से काम नहीं चलेगा | किसी-किसी रोगी में यह पथरी तो सामान्य रेत बनकर बाहर निकलती है , तब रोगी को कोई कष्ट भी नहीं होता है | कभी-कभी तो रोगी की पथरी इतनी सख्त हो जाती है किं वह इन आयुर्वेदिक औषधियों से से भी बाहर नहीं निकल पाती है | ऐसी अवस्था में रोगी को चिकित्सक को दिखाना अति आवश्यक हो जाता है , क्योंकि यह एक ऐसी स्थिति है , जिसमें ऑपरेशन द्वारा ही पथरी को बाहर निकाल कर रोगी को आराम मिलाया जा सकता है | इसीलिए ऐसी स्थिति में रोगी को कुशल चिकित्स्क के पास ले जाना ही उचित होता है |
जय आयुर्वेद
Web - 1najar.in

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

इलाज ; एसिड अटैक [1/15 ] D

web - gsirg.com इलाज ; एसिड अटैक के क्या कारण आजकल अखबारों में तेजाब से हमले की खबरें पढ़ने को मिल ही जाती हैं। तेजाब से हमला करने वाले व्यक्ति प्रायः मानसिक बीमार या किसी हीनभावना से ग्रस्त होते हैं। ऐसे लोग अपनी हीनभावना को छिपाने तथा उसे बल प्रदान करने के लिए अपने सामने वाले दुश्मन व्यक्ति पर तेजाब से हमला कर देते हैं। कभी-कभी इसका कारण दुश्मनी भी होता है , इसके अलावा कभी-कभी लोग अपनी आत्मरक्षा के लिए भी एसिड अटैक का अवलंबन कर लेते हैं। कारण कुछ भी हो किंतु इसमें पीड़ित को कई प्रकार की परेशानियों का सामना करना ही पड़ता है। ऐसे हमलों का होना या ऐसी घटनाएं होना हर देश में आम बात हो गई है। इस्लामी देशों में लड़कियों को उनकी किसी त्रुटि के कारण तो ऐसी धमकियां खुलेआम देखने को मिल जाती हैं। \\ शरीर का बचाव \\ यदि के शरीर किसी पर तेजाब से हमला होता है , उस समय शरीर के जिस भाग पर तेजाब पड़ता है , वहां पर एक विशेष प्रकार की जलन होने लगती है | इस हमले में शरीर का प्रभावित भाग बेडौल , खुरदरा और भयानक हो सकता है | इस हमले से पीड़ित व्यक्ति शरीर की त...

[ d/1 ]धर्म ; सत्य केवल एक ही है

web - gsirg.com सत्य केवल एक ही है यह संसार मानव के झूठ और सच से भरा हुआ है। प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि झूठ हजारों हो सकते हैं। परंतु सच केवल एक ही होता है। अर्थात सत्य अनेकों नहीं है केवल एक ही है। जबकि झूठ अनेकों प्रकार के और अनेकों प्रकार के हो सकते हैं। परन्तु अनेको में केवल एक ही सत्य की अभिव्यक्ति होती है | जिस प्रकार से अगर पानी में देखा जाए तो चंद्रमा पानी के हर जलकण में अलग अलग दिखता प्रतीत होता है | जबकि यह तो सभी जानते हैं कि चंद्रमा केवल एक ही है। ठीक इसी प्रकार सत्य भी केवल एक ही है। इसे अनेकों रूपों में मान लेना अज्ञानता है। यह तो हो सकता है कि उस एक सत्य तक पहुंचने की मार्ग अलग अलग हो सकते हैं। हर मार्ग से सत्य के पास पहुंचा जा सकता है , परंतु जो व्यक्ति मार्ग के आकर्षण में उलझ कर उसके मोह मे पड़ जाता है , उस समय उसका मार्ग वही से बंद हो जाता है। ऐसे में सत्य की समीपता प्राप्त करने के लिए कोई रास्ता नहीं बचता है। यही कारण है कि उस सत्य प्राप्तकर्ता के लिए सत्य दुर्लभ ही बना रहता है। सत्य का सापेक्ष रूप प्रत्येक मानव महसूस करता है कि ...

इलाज ; कुष्ठ रोग जानकारी और बचाव

web - gsirg.com इलाज ; कुष्ठ रोग जानकारी और बचाव यह एक घृणित रोग है | इस रोग में आदमी के शरीर के अंगों का गलना शुरू हो जाता है | इस रोग से प्रभावित अंगों से दुर्गंधयुक्त मवाद निकलने लगती है , धीरे-धीरे रोगी के यह अंग गल गल कर बहने लगते हैं | रोग की चरमावस्था पर धीरे-धीरे के अंग शरीर से गायब या समाप्त हो जाते हैं | जिसके कारण कोई अन्य व्यक्ति उसके पास उठता बैठता या खाता पीता नहीं है | इसके अलावा वह रोगी से किसी प्रकार का संबंध भी नहीं रखना चाहता है | दूसरे शब्दों में अगर कहा जाए तो लोग ऐसे रोगी को घृणा की दृष्टि से देखते हैं | इस रोग का रोगी स्वयं भी अपने आप से घृणा करने लगता है , कभी-कभी तो रोगी रोग से परेशान होकर आत्महत्या करने का विचार भी करने लगता है | कुष्ठ हर चूर्ण बनाना कुष्ट के रोगी को चाहिए कि वह अपने रोग से निजात पाने के लिए यह चूर्ण बना ले | इसके लिए रोगी को बकायन नामक वृक्ष के बीज इकट्ठा करना होता है | इन बीजों की मात्रा जब 2 किलो ग्राम के लगभग हो जाए , तब इनकी साफ-सफाई कर ले , ताकि उन पर लगी धूल मिट्टी आदि निकल जाए | अब इन बीजों की आधी मात्रा यानी 1 किल...