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इलाज ; स्वप्नदोष [28 ]

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इलाज ; स्वप्नदोष
यह नवयुवकों को होने वाला एक ऐसा रोग है , जिसने बहुत से युवाओं को अपनी गिरफ्त में ले रखा है। इसके जो भी भुक्तभोगी है , वह लोग ही इसकी पीड़ा को अच्छी तरह से समझ पाते हैं। रोग की प्रारंभिक अवस्था में पहले रोगी लापरवाही बरतता है। कुछ दिनों के पश्चात उसके मन में इसका इलाज कराने की बात समझ में आती है। क्योंकि यह एक गुप्त रोग है , इसलिए पहले वह हिचकिचाता है , परंतु जब उसे समझ में आता है कि रोग भयंकर हो गया है , तब वह सारी शर्मो-हया को छोड़कर इलाज करने की सोचता है। इसका इलाज करने से पूर्व इस रोग के विषय में जान लेना जरूरी है।
रोग की प्रकृति
इस रोग का रोगी जिस समय निद्रा अवस्था में होता है उस समय उसके मूत्र मार्ग द्वारा वीर्य का पतन हो जाता है। स्वप्न में वह अपने को कामुक अवस्था में पाकर या किसी लड़की के साथ रतिक्रिया में लिप्त रहने का आभास करता है। उसके तुरंत बाद ही उसका वीर्य स्खलित हो जाता है। रोग की भीषण अवस्था में तो रोगी जान ही नहीं पाता है , कि उसे स्वप्नदोष हो चुका है।
स्वप्नदोष के कारण
इस रोग होने का एक प्रमुख कारण है , कि उस पुरुष का वीर्य कामुक मानसिक चिंतन या कुटेवों के कारण पतला हो जाता है , जिसके कारण रोगी की स्तंभन शक्ति की कमी आ जाती है। उसके कुकर्म और कुटेवों के कारण ही उसका वीर्य क्षरण होना प्रारंभ हो जाता है। अश्लील वातावरण में रहना , अश्लील बातें करना , कामोत्तेजक पुस्तकें पढ़ना , कामुक चिंतन करना ही इस रोग को उतपन्न कर देते हैं। रात्रि का भोजन अधिक मात्रा में करने से रोगी को कब्जियत बनी रहती है। जिससे उसके अमाशय में आंतों के मलावृत्त होने से , या दूषित वायु के प्रभाव से का शुक्राशय प्रभावित होता है। यहां पर घर्षण होने से वीर्य स्खलित होकर मूत्र मार्ग द्वारा बाहर निकल जाता है | अपनी ऐसी अवस्था पर रोगी दुखी होता है , और सदैव चिंतित बना रहता है।
सहायक कारण
सिनेमा अथवा पुस्तकों में कामुक दृश्य देखकर उन पर विचार करना इस रोग के सहायक कारण है | कामुक उपन्यास पढ़ना और गलत लोगों की सोहबत , अश्लील नृत्य व नाटक आदि देखना , अश्लील संगीत और गीत पढना इस रोग होने के सहायक कारण हैं। उपरोक्त कारणों से रोगी के मस्तिष्क में कामुक भावनाएं जन्म लेती हैं , जो इस रोग का प्राथमिक कारण बनती है।
लक्षण
रोगी को दिन हो या रात निद्रावस्था में ही कामोत्तेजक दृश्यों को देखकर वीर्यपात होना ही इस रोग काप्रमुख लक्षण है। लगातार स्वप्नदोष होते रहने से उस रोगी की धातु पुष्टि नहीं हो पाती है. इसके साथ ही रोगी के चर्बी, मांस , रक्त , धात , हड्डी और मज्जा आदि दुर्बल होते चले जाते हैं | जिसके कारण उसे बेचैनी बने रहना , दिन हो या रात हरदम उदासी बने रहना , तथा किसी कार्य के प्रति उदासीनता इस रोग का प्रमुख लक्षण है | यदि यह रोग काफी दिनों तक बना रहे , और इसका इलाज न किया जाए तो यह बीमारी जीवन भर बनी रहती है | जिसके कारण शरीर के अंदर गांठे , फुंसियां , नेत्रों की दुर्बलता तथा मूत्र के साथ मवाद आना और जलन होना आदि भी इसके अन्य लक्षण भी हैं जो बाद में रोगी को महसूस होने लगते हैं।
चिकित्सा
इस रोग का उपचार करते समय रोगी को चाहिए कि वह सबसे पहले किसी भी प्रकार के कामुक कृत्य से दूर रहे। यदि ऐसा नहीं कर सकता है , तो यह भी बीमारी ठीक नहीं की जा सकती | इसके अलावा भोजन में तेल से तले पदार्थ खटाई तथा मिठाई आदि को चिकित्सा में लाभ न होने तक छोड़ने को तैयार रहना होगा | इसके बाद भी चिकित्सा की जा सकती है |
स्वप्नदोष के इलाज के लिए पाताल गारुडी जिसे, छिरेंहटा भी कहते है , एक प्रसिद्ध औषधि है | इसके छाया में सुखाये हुए पत्ते ढाई सौ ग्राम तथा भुनी हुई छोटी काली हरड़ 60 ग्राम ले। इस बात का ध्यान रखें कि छोटी हरड़ों को देसी गाय घी में ही भूनें। अब दोनों ही औषधियों को खरल में डालकर खूब महीन महीन चूर्ण बना लें। इसके बाद इसमें 60 ग्राम मिश्री भी मिला दे। इस मिश्रण की एक तोला से डेढ़ तोला की मात्रा प्रातः काल और सायंकाल गाय के दूध के साथ लिया करें। इस औषधि से चाहे जिस प्रकार का और चाहे कितना ही भयानक स्वप्नदोष हो , अवश्य मिट जाता है।
बहुधा लोग कुछ दिनों तक किसी का प्रयोग करते हैं और कुछ ही दिनों में लाभ न मिलने पर बंद कर देते हैं। इससे रोग बढ़ता ही जाता है। इसलिए जब भी कोई दवा लेना शुरू करें उसे लाभ न होने तक अवश्य करें। इसलिए मेरा अनुरोध है कि इस औषधि को भी कई बार बनाकर , तब तक प्रयोग करें , जब तक कि रोग से छुट्टी न मिल जाए। एक बार दवा प्रारंभ करें तब उसे बिल्कुल भी बंद न करें। क्योंकि फायदा तो आपको ही लेना है। अगर आप को ठीक होना है तो इस औषधि को भी अंत तक चलाना ही होगा। याद रखें अगर आप बार-बार औषधि बदलेंगे तो आपको फायदा नहीं करेगी। यहां एक विशेष बात का ध्यान दें , कि गुप्त रोगों में कोई भी औषधि तब तक लाभ देना नहीं प्रारम्भ करेगी जब तक कि आमाशय शुद्ध नहीं होगा। इसलिए इलाज शुरू करने से पूर्व आमाशय की शुद्धि अवश्य करवा लें। इस बात को ध्यान रखें और लाभ उठाएं
जय आयुर्वेद
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