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  [ g ] आर्थराइटिस का इलाज 
आर्थराइटिस एक वायु विकार है जिसकी उतपत्ति तब होती है जब शरीर की गंदगी जब जोड़ो मे जमा होती जाती है | वात रोग अचानक ही नहीं होता है , अपितु इसके पूर्व अनेक तीव्र रोगों की एक अटूट श्रंखला होती है | रोग होने से पूर्व। पीड़ित व्यक्ति को ज्वर जरूर रहता है | इसके अलावा पीड़ित द्वारा भोजन में अम्ल कारक पदार्थों का अधिकता से प्रयोग भी इस रोग के उत्पन्न होने का प्रमुख कारण होता है | अर्थराइटिस की समस्या से पीड़ित व्यक्तियों के लिए , जाड़े का मौसम अधिक कष्टदाई होता है , इसका कारण है कि यह वही दिन है जब घुटनों और अन्य जोड़ों के दर्द के मामले अधिकता से सामने आते हैं |

रोग होने के फौरी कारण

सर्दियों के दिनों में अचानक घुटनों के दर्द , जोड़ों के दर्द बढ जाने के कई कारण हैं | इन दिनों में जब मौसम का तापमान घटता है तब सामान्य दिनों की तुलना मे शरीर के जोड़ अधिक कठोर हो जाते हैं | इस कठोरता के कारण ही घुटनों में तेज दर्द होता है | जैसे-जैसे वातावरण के तापमान मे व्यापक परिवर्तन होता है , वैसे वैसे सूजन भी बढ़ती जाती है , जिसके कारण आसपास की नसों में घर्षण भी बढ़ता जाता है | यही कारण है कि घुटने मे दर्द और कड़ेपन का एहसास भी धीरे-धीरे बढ़ता रहता है |

दूसरा कारण

अर्थराइटिस के दूसरे कारणों मे थोड़ा-थोड़ा वातावरणीय कारक और थोड़ा थोड़ा मानवीय गतिविधियां शामिल हैं | इन्हेही हम सर्दियों में आर्थराइटिस के बढ़ने के दूसरे कारणों के रूप में जान सकते हैं | सर्दियों के घीरे धीरे बढ़ते रहने के कारण , रोगियों में धीरे-धीरे आलस्य आने लगता है | इसलिए पीड़ित लोग सुबह उठकर टहलना , व्यायाम करना और अन्य शारीरिक गतिविधियां भी कम कर देते हैं , या फिर बंद ही कर देते हैं , या फिर करते ही नही है | जिसके कारण घुटने समेत अन्य जोड़ों का गतिशीलन बंद हो जाता है | परिणामस्वरुप यह स्थिति जोड़ों के लिए समस्या पैदा करने का कारण बन जाती है |

रोकथाम

इस रोग से पीड़ित रोगियों को चाहिए कि वे ऐसी मुद्रा में न रहे , जिन से जोड़ों पर दबाव पड़ता हो जैसे , घुटनों की अर्थराइटिस मे व्यक्ति को चाहिए कि वे जमीन या फर्श पर उकड़ू न बैठें | उन्हें चाहिए कि वह अपने को ठंड से बचाने के लिए पर्याप्त ऊनी कपड़े पहने , ताकि प्रभावित जोड़ ठंड से बचे रहें | पीड़ित व्यक्तियों को चाहिए कि वह अपने प्रतिदिन के व्यायाम में शिथिलता न करें , और न ही झटके से अपनी क्षमता से अधिक बोझ उठाएं | यदि तकलीफ ज्यादा हो तो तुरंत चिकित्सक के पास जाकर इस विषय में उचित सलाह लें , तथा उसके द्वारा बताई गई औषधियों का नियमित रूप से सेवन करें | आमतौर पर रोगी खुद ही अपने दर्द से निजात पाने के लिए अपने आप ही पेनकिलर खरीद लेते हैं , और उनका सेवन करने लग जाते हैं | जिसे अनुचित ही कहा जाना चाहिए | बिना चिकित्सक की सलाह के किसी प्रकार का पेनकिलर प्रयोग न करें |

आयुर्वेदिक चिकित्सा

गठिया के रोगी को चाहिए कि वह अरंड की पौधे को खोज कर , उसकी जड़ को घर लाकर छाया में सुखा ले | पूरी तरह से सूखी हुई जड़ को कूट-पीसकर महीन महीन चूर्ण बना लें | इस चूर्ण की 6 ग्राम मात्रा को दिन मे 3 बार गिलोय के काढ़े के साथ सेवन किया करें |

गिलोय का काढ़ा बनाने की विधि

रोगी को चाहिए कि वह पर्याप्त मात्रा में नीम पर चढ़ी हुई गिलोय को घर ले आए | अब इसकी 20 ग्राम मात्रा लेकर 1/4 लीटर पानी मे उबालना शुरू करे जब पानी उबलते - उबलते 1/4 मात्रा में बचे तब उसे अरंड चूर्ण के साथ सेवन कर ले | यह काढा रोगी को हर बार नया बनाना पड़ता है |


पूरक चिकित्सा

रोगी को चाहिए कि इसके साथ ही पूरक चिकित्सा भी करता रहे | इसके लिए 20 ग्राम नमक , 30 ग्राम अजवाइन , 50 ग्राम सोंठ तथा 120 ग्राम हरड़ को कूट-पीसकर चूर्ण बना लें | इस चूर्ण की 6 ग्राम मात्रा सुबह और शाम , ताजे पानी के साथ सेवन करे | इससे गठिया रोग को ठीक होने में शीघ्रता होती है |

जय आयुर्वेद \\🔺🔻

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