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गुलाम कश्मीर

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आदरणीय सम्पादक जी
                           सादर प्रणाम

       आधुनिक युग में गुलामी किसी बदनुमा धब्बे से कम नहीं है।देश को आजाद हुए लगभग 73 वर्ष हो चुके हैं।पी.ओ.के.वाला कश्मीर आज भी गुलाम कश्मीर के नाम से ही पहचाना जा रहा है।गुलामी का दंश झेलने पर आज भी मजबूर है।
        सन् 1947 ई० में जम्मू कश्मीर के तत्कालीन महाराजा श्री हरी सिंह का राज्य था।इनके लड़के कर्ण सिंह जवाहर लाल नेहरू के निकट सहयोगी थे।श्री हरी सिंह जी को दोहरी मार झेलनी पड़ी।पाकिस्तान ने जम्मू कश्मीर पर आक्रमण कर दिया और पी.ओ.के.कहा जाने वाले हिस्से पर अवैध कब्जा कर लिया।और उस जीते भूभाग को ही गुलाम कश्मीर की संज्ञा दी।
       जवाहर लाल नेहरू किसी भी कीमत पर शेख अब्दुल्ला को ही जम्मू कश्मीर का शासक बनाने पर तुले हुए थे।जवाहर लाल नेहरू ने शर्त लगा दी थी कि शेख अब्दुल्ला को प्रशासक नियुक्त करने पर ही भारत की सेना लड़ने जाएगी।जब आप शेख अब्दुल्ला को प्रशासक नियुक्त करेंगे।मजबूरन शेख अब्दुल्ला को अंतरिम प्रशासक नियुक्त करना पड़ा।और गुमनामी की मौत मरने के लिए महाराज हरी सिंह बम्बई चले आए।

        बलूच लोग भारत में मिलना चाहते थे।मगर जम्मू कश्मीर और बलूचिस्तान के लोगों की गुहार पर जवाहर लाल नेहरू नें उदासीनता बरकरार रखी।इस तरह हमारे हाथ से अक्साई चिन,बलूचिस्तान, गुलाम कश्मीर चाचा नेहरू की उदासीनता और मुस्लिम प्रेम के चलते हमारे हाथ से निकल गए।
         महाराज हरी सिंह जी पूरी जम्मू कश्मीर राज्य को भारत सरकार के हवाले करने के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए थे।

       अब जम्मू कश्मीर का नेहरु का लादा कोढ़ 370 मोदी सरकार ने समाप्त कर दिया है।अब केवल गुलाम कश्मीर का बदनुमा दाग हटाकर भारत में मिलाने का कार्य शेष है।मोदी हैं तो यह भी मुमकिन है।

प्रमोद कुमार दीक्षित, सेहगों, रायबरेली।

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