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भोजन की बर्बादी

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आदरणीय सम्पादक जी

                              सादर प्रणाम

         भोजन का कण और आनन्द का क्षण कभी बर्बाद नहीं करना चाहिए।इसी एक -कण भोजन के लिए हम दिन रात कड़ी,हांड़-तोड़ मेहनत करते हैं।अन्न देवता के लिए ही किसान भगवान दिन-रात कठिन परिश्रम, हांड़-तोड़ मेहनत करके ही अन्न उपजाता है।चन्द्र भूषण त्रिवेदी"रमई काका"ने अपनी कृति "बौछार"में बड़ा ही सुन्दर विवरण अन्न देवता के लिए लिखा है।-----कहि रही घरैरिनि मुनुवा से रे पूतु अन्नु बिखराव न तुम।ए बड़े परिश्रम के मोती इनका माटी म मिलाव न तुम।।"अर्थात इन परिश्रम के मोती को बर्बाद न करने की सलाह कवि ने दी है।
        हमारे यहाँ शादी,पार्टी में खाने से ज्यादा भोजन पत्तलों में बर्बाद कर दिया जाता है।तथा शादी-पार्टी के बाद में बचा भोजन भी व्यर्थ में फेंक दिया जाता है।बस एक ही बात कही जाती है कम नहीं पड़ना चाहिए ताकि बेइज्जती न होने पाए।बर्बाद भले ही हो जाए।ऐसा नहीं है खाने वालों से निवेदन है कि जितना खाना खा सको उतना ही भोजन पत्तलों,प्लेटों में निकालना चाहिए।।
        आंकड़े गवाह हैं कि हमारे भारत देश में जितने भोजन की जरूरत होती है उससे दोगुना भोजन रोज पकाया जाता है।तथा आंकड़े यह भी गवाही देते हैं कि लाखों लोग बिना भोजन के भूखे सो जाते हैं।हमारे यहां एक कहावत है कि दो खुराक भोजन अधिक बनाना चाहिए ताकि अतिथि के आ जाने की सूरत में भोजन कम न पड़े।जबकि अतिथि रोज-रोज नहीं आते।जबकि भोजन रोज दो खुराक अधिक बनाया जाता है और फेंका जाता है।
         सारांश यह है कि अब जरूरत एक फूड बैंक की है।और एक दल होना चाहिए जो प्रतिदिन शादी,पार्टी और प्रत्येक घर से भोजन एकत्रित कर जरूरत मंदों तक बचे भोजन को पहुंचा सके ताकि किसी को भूखों न सोना पड़े।और अन्न का कण भी बर्बाद न हो सके।

प्रमोद कुमार दीक्षित, सेहगों, रायबरेली।

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