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लुप्त होते महिला मंगल गीत

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आदरणीय सम्पादक जी
                              सादर प्रणाम

        लोकगीतों की कड़ी में महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले मंगलगीतों का प्रथम स्थान हुआ करता था।महिलाओं द्वारा शादी ब्याह,मुण्डन, छेदन आदि मांगलिक सुअवसरों पर विभिन्न प्रकार के गीत हुआ करते थे।यथा---उड़द और मूंग की बड़ियां बनाए जाने के समय के गीत,मण्डप रोपित होने पर प्रतिदिन सांझ न्यौतने के गीत,तेल चढ़ाए जाने के समय के गीत,द्वार-चार के गीत,स्वागत गीत,खाना खाने के समय के गीत,ब्याहा-भात के समय के गीत,कलेवा के समय के गीत,विदाई गीत आदि।इसके अतिरिक्त होली गीत,गोबर के बल्ला बनाए जाने के समय के गीत।रक्षाबंधन, नागपंचमी के गीत,सावन पर झूला गीत।
      कुल मिलाकर हर मांगलिक अवसर के अलग-अलग महिला मंगल गीतों की सिरीज हुआ करती थी।समय बदला महिला मंगल गीतों के स्थान पर फिल्मी गीत गाए जाने लगे।पुराने जमाने के महिला गीतों में सुर-ताल तथा रस हुआ करता था।अब के फिल्मी गानों में फूहड़ता, अश्लीलता ही परोसी जा रही है।द्विअर्थी गीतों का चलन चल पड़ा है।
     हमारे यहाँ शास्त्रोक्त विधि से वैदिक रीति से शादी का विधान रहा है।उसी अनुसार मांगलिक गीतों के गाए जाने का विधान रहा है।नव ग्रह शांति, पूर्वजों का निमंत्रण आदि गीतों के माध्यम से गाए जाते थें।और हर गीत में मंगलकामना ही होती थी।अब केवल डी.जे. और बैण्डबाजों का शोरगुल ही बाकी शेष बचा है।अब ऐसे लोकगीतों का गायन केवल रेडियो पर ही सुनाई देते है।बाकी केवल फिल्मी गानों की ही बहार है।चारों ओर कानफोड़ू संगीत ही बजता है।उन पुराने गानों में अपनत्व और मिठास हुआ करती थी।

     अब शायद ही वह समय लौटकर आए जब महिलाओं द्वारा गाई जाने वाले सोहर,नकटा,गारी ,भजन,होली गीत सुनने को मिले।ब्याहा-भात ही बन्द हो चुका है तो गीत कहाँ बचेंगे।

इन गारिन का माख न मानेव गारी प्रेम पियारी जी।

प्रमोद कुमार दीक्षित, सेहगों, रायबरेली।

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                             सादर प्रणाम


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