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पुरातनम् बीज बनाम अद्यतन

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आदरणीय सम्पादक जी

                               सादर प्रणाम

        पुराने जमाने में रासायनिक खादों, उर्वरकों, कीटनाशकों के प्रयोग के बिना केवल गोबर की खाद से जो अन्न पैदा किया जाता था उस अन्न की खुश्बू, स्वाद लाजबाब होता था।खेत,खलिहानों, बागों,चरागाहों में चरकर आई गाय,भैंसों के दूध में गजब का स्वाद और प्रचुर मात्रा में औषधीय गुण होते थे।
       तब के देशी घी में भी गजब की सुगंध पाई जाती थी।खरा करने हेतु कड़ाही में गरम करते वक्त देशी घी की मोहक सुगंध फैल जाया करती थी।जिससे पड़ोसियों को भी पता हो जाता था कि अमुक घर में देशी घी बन रहा है।
     आयुर्वेद में अनुपान के रूप में जिस दूध का वर्णन मिलता है वह छुट्टि चरने वाली देशी गाय का दूध ही माना जाता है।खूंटे से बांधकर नांद में चारा,भूसा खिलाने वाली गाय के दूध में उतने औषधीय गुण नहीं होते हैं जितना छुट्टा चरने वाली गाय के दूध में पाए जाते हैं।
      देशी भूने चने में जो खुश्बू, सोंधापन गोबर की खाद से उपजाए चने में होती थी वह उर्वरकों से उत्पादित चनों में नहीं पाई जाती है।औषधीय गुण भी नहीं पाए जाते हैं।
      पुराने जमाने के चावल "बादशाह पसंद"की पसंद के कायल आधुनिक युग के लोग आज भी हैं।वहीं खुश्बू और स्वाद को आज भी लोग दीवानावार बनकर ढ़ूंढ़ रहे हैं।अब बादशाह तो बचे नहीं हैं जैसे धनकुबेर अपनें को नकली बादशाह मानते हैं वैसे ही नकली "बादशाह पसंद"चावल भी खाते हैं।
      पहले भगोना या बटुई में जब बादशाह पसंद चावल पकाया जाता था तो उसकी फैली खुश्बू से ही अड़ोस-पड़ोस के लोग जान जाया करते थे कि अमुक घर में "बादशाह पसंद"चावल पक रहा है।गोबर की खाद से उत्पादित आलू भूनने में जो खुश्बू, स्वाद,सोंधापन मिलता था अब नगण्य है।

        अब शंकर प्रजाति के बीजों और उर्वरकों, कीटनाशकों के उपयोग से उत्पादित सब्जी,फल,फूल,अनाज से लगभग सवा अरब जनसंख्या का पेट तो आसानी से भर जाता है ।तथा हम निर्यात की स्थिति में भी हैं।लेकिन वह स्वाद और खुश्बू, औषधीय गुणों से भरपूर पुरानी खुश्बू, स्वाद,औषधीय गुण हम दीवानावार हो ढ़ूंढ़ते हैं।

        अतःसरकार से निवेदन है कि पुराने बीजों को संरक्षित करने की कृपा करें।

प्रमोद कुमार दीक्षित, सेहगों, रायबरेली।

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