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राजनेताओं की गिरती साख

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आदरणीय सम्पादक जी
                               सादर प्रणाम

     एक समय था जबराजनीति में राजनेता एक दूसरे का आदर सम्मान करते थे, भले ही वह विभिन्न विचारधारा और विभिन्न दलों से सम्बंधित होते थे।अटल बिहारी वाजपेयी जी इसके सशक्त हस्ताक्षर थे।जिनका सम्मान सभी दलों के सांसद किया करते थे।

         चौधरी चरण सिंह जी भी श्रीमती इंदिरा गांधी जी के धुर विरोधी होने के बावजूद श्रीमती इंदिरा गांधी जी के सुख-दुख में सदैव साथ खड़े नजर आते थे।प्रधानमंत्री पद की अपनी एक अलग गरिमा होती है।गुजरे जमाने के राजनेता कभी भी इस पद की गरिमा को ठेस पहुंचाने का काम नहीं करते थे।कभी भी एकदूसरे पर व्यक्ति गत टिप्पणी नहीं किया करते थे।वैचारिक और राजनीतिक भेद अपनी जगह पर थे।लेकिन निजी जिंदगी में शत्रुता के भाव का सर्वथा अभाव था।

       आज राजनीति और राजनेताओं दोनों का स्तर काफी नीचे गिर गया है।एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए काफी नीचे गिर चुके हैं।प्रधानमंत्री पद की गरिमा भी तार-तार हो चुकी है।"चौकीदार चोर है।"जैसे अमर्यादित और बिगड़े बोल इसके सशक्त उदाहरण हैं।

        राजनेताओं की जबानें अक्सर फिसल जाया करती हैं।समाज को जाति-धर्म में बांटने की शुरूआत इन राजनेताओं की ही देन है।भारत में गंगा-जमुनी तहजीब और सभी जाति-धर्म के लोग आपस में मिल-जुल कर रहते थे।कुर्सी और सत्ता के खेल में राजनेताओं ने समाज को इस हद तक बांट दिया है कि लोग एक दूसरे जाति धर्म के खून के प्यासे नजर आते हैं।। 

        वोट देनें वालों की दशा और दिशा निरंतर खराब होती जा रही है।वोट लेने वालों की दशा और दिशा निरंतर सुदृढ़ होती जा रही है।मतदाता भाग्य विधाता की जगह राजनेताओं के हाथ की कठपुतली होकर रह गए हैं।राजनेता जब घाहते हैं वोट और सत्ता सुख के लिए जाति धर्म के दंगे करवा देते हैं।सैकड़ो लोगों की जिंदगी से खेलना इनका राजनीतिक खैल बनता जा रहा है।खून,आगजनी, बलबा इनके प्रिय हथियार बनते जा रहे हैं।परिणाम अंततः गरीब और निर्दोष जनता को भुगतना पड़ता है।जाति-धर्म की भावना भड़का कर अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं।

        राजनीति और राजनेताओं को आदर्श और अच्छा आचरण प्रस्तुत कर गिरती साख को बचाने की जरूरत है।गुण्डा-बदमाश, लुच्चा-लफंगा, कातिल-माफिया सभी लोग राजनेता बनकर सफेद-बुर्राक खादी में अपने दाग ढ़कने का सशक्त जरिया बनाकर अपने गैरकानूनी कामों को कानून से बचने-बचाने का जरिया बनाते जा रहे हैं।अपनी सम्पत्ति को दिन दूनी रात चौगुनी गति से बढ़ा रहे हैं।योग्य और समाज सेवक सांसदों का सर्वथा अभाव होता जा रहा है।गिरती साख को बचाने के लिए संघर्ष करने की जरूरत है।

प्रमोद कुमार दीक्षित, सेहगों, रायबरेली।
 

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