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घटता श्रृम,बढ़ते रोग



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आदरणीय सम्पादक जी
                            सादर प्रणाम

         आराम और विलासिता रोगों के भण्डार का निमंत्रण है।जैसे-जैसे हम आराम और विलासिता की ओर बढ़ते जा रहे हैं विभिन्न प्रकार के रोगों के भण्डार की ओर भी बढ़ते जा रहे हैं।कभी हमारे यहाँ मशीनरी और कल कारखानों का अभाव था तो हम शारीरिक श्रम से रोजमर्रा के उपयोग में आने वाली वस्तुओं को प्राप्त करते थे तो हम निरोगी और शतायु हुआ करते थे।अब हम आरामदायक और विलासिता की वस्तुओं को प्राप्त करते जा रहे हैं।और हमारी औसत आयु घटती ही जा रही है।और हम रोगों की ओर भी अग्रसर होते जा रहे हैं।कभी हम मूसलों द्वारा कूटे चावल और घर की चकिया से पीसे आटें को खाते थे।और पैदल यात्रा किया करते थे तो हम ताकतवर और निरोगी तथा शतायु हुआ करते थे।चकिया पीसने वाली गर्भवती महिलाओं को घर पर ही दाइयों द्वारा प्रसव करवा लिया जाता था।आज हमारे पास शारीरिक श्रम का सर्वथा अभाव सा है।हमारी प्रसूताओं को डाक्टरों द्वारा कम्पलीट बेड रेस्ट की सलाह दी जाती है।बिना आपरेशन के प्रसव नहीं होता है।और पुरुषों/महिलाओं में शुगर,ब्लडप्रेशर बढ़ता ही जा रहा है।
      आज के समय मे दुनिया में सबसे ज्यादा रक्त चाप हृदयरोग और शुगर रोग(मधुमेह)के रोगियों की संख्या स्थान ब ढती जा रही हैं।यही कारण है कि शारीरिक बल और काम करने की क्षमता घटती ही जा रही है।महिलाओं में एनीमिया और कैल्शियम की कमी लगभग 80% तक जा पहुंची है।

      स्वास्थ्य बजट लगातार बढ़ता ही जा रहा है।विज्ञान द्वारा प्रमाणित हो चुका है कि चकिया पीसने वाली औरतों को नार्मल प्रसव ही होता है।महीन चावल और महीन आटा में ताकत कम होती है।फिर भी हम महीन चावल और महीन मैदा खाना अमीरी का सूचक मानते हैं।अगर यहीं विकास है तो हम विकास नहीं विनाश की जा रहे हैं।सारा काम लगभग मशीनों द्वारा ही होता है यहीं कारण है कि हम शारीरिक ताकत खोते जा रहे हैं।

          ताकत की दवाएं, कैपसूल, इंजेक्शन के द्वारा ही स्टेमिना और बल प्राप्त करते जा रहे हैं।और रोगों का भण्डार बढ़ाते जा रहे हैं।घर-घर पाई जाने वाली चकिया विलुप्त होती जा रही हैं।कभी चकिया का लोकगीत प्रचलित हुआ करता था।------

        "चकिया सब राजन की रानी।चकिया सब राजन की रानी।जहिकै चकिया चलै सबेरे वहिकै पूरि किसानी।चकिया सब राजन की रानी।जहिकै चकिया चलै दुपहरे वहिकै ऐंचा-तानी चकिया सब राजन कै रानी"।

          अब न तो चकिया है न मूसल।शादी ब्याह में मूसल की जरूरत पड़ती है तो अक्सर मांग कर ही आता है।

         शारीरिक श्रम के अभाव के कारण ही रोगों का भण्डार और स्वास्थ्य बजट बढ़ता जा रहा है।दण्ड, बैठक,कसरत अब किताबों की वस्तु बनती जा रही है।अब शराब, वाइन,विह्स्की,गुटखा सिगरेट का चलन बढ़ता जा रहा है।"सेहत लाख न्यामत है।"घटता ही जा रहा है।अगर शुगर,ब्लडप्रेशर, आपरेशन द्वारा प्रसव रोकना है तो शारीरिक श्रम बढ़ाना ही होगा।

प्रमोद कुमार दीक्षित, सेहगों, रायबरेली।

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