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आटोमेटिक राइफल्स फैक्ट्री का भारत मे न होना

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आदरणीय सम्पादकजी 
                                 सादर प्रणाम 
           आज हमारा देश भारत मिसाइल टेक्नोलॉजी, तथा अंतरिक्ष विज्ञान में तथा जलपोत क्षेत्र में एक से बढ़कर एक ऊँचे सोपानों पर विराजमान हो रहा है।भारतीय सेनाओं जल, थल,वायु तीनों सेनाओं की रक्षा जरूरतों तथा उपकरणों की के हिसाब से आयुध कारखाने और उन्नत टेक्नोलॉजी तथा,डिजाइन के अभाव के कारण ही हम अपनी तीनों सेनाओं के रक्षा उपकरण और साजो-सामान की खरीद विदेशों से करने के लिए मजबूर हैं।तीनों सेनाओं की जरूरत के लिए हल्के हेलीकॉप्टर भी हम भारत में जरूरत के हिसाब से निर्माण नहीं कर पा रहे हैं।एविएशन क्षेत्र में H.A.L.के अलावा कोई भी बड़ा नाम नहीं है।आजादी के 70 साल बीत जाने के बाद भी तीनों सेनाओं के जरूरत में काम आने वाली राईफल बनाने का कोई भी कारखाना न होने के कारण हम अमेरिका से 72000 के लगभग राईफलें खरीदने को मजबूर हैं।सन् 1990 में ही पहचान कर ली गई थी कि आतंकवादियों की तुलना में सेना की राइफलें अपेक्षाकृत कम उन्नत तकनीक की हैं।फिर भी आज तक की सरकारों ने कोई खरीद न की थी।अब जब मोदी सरकार ने यह समझदारी भरी उत्तम खरीद की है तो यह मोदी सरकार बधाई की और प्रशंसा की हकदार तो बनती ही है।हमारे भारत देश में जब भी रक्षा सौदों के खरीद की बात होती है तो सबसे पहले विपक्ष द्वारा कमीशन की बात जरूर उठाई जाती रही है।जैसे इस समय राफेल विमान सौदे को लेकर विपक्ष तमतमाया हुआ और संसद नहीं चलने दे रहा है।संसद के दो कीमती सत्र हंगामे की भेंट चढ़ गए।जनता का खून पसीने की कमाई टैक्सों द्वारा वसूली गई रकम व्यर्थ में बरबाद की गई।मेक इन इंडिया के तहत अब कुछ प्राइवेट सेक्टर के ज्वाइंट वेंचर से विमानन क्षेत्रों में काम शुरू होने की आशा है।
सरकार से निवेदन है कि सेनाओं की जरूरत का अहम हथियार राईफलों के निर्माण में आत्म निर्भर होने की जरूरत है।बड़े शर्म की बात है कि आजादी के 70 साल गुजर जाने के बाद हमारे पास राईफलें बनाने का एक भी कारखाना नहीं है।हमारे पास धन है,दिमाग है,जमीन है सब कुछ है फिर भी इस क्षेत्र में हम आत्म निर्भर नहीं हो सके हैं।

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