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आन्दोलनों के दौरान हिंसा और राष्ट्रीय सम्पति की क्षति



आदरणीय सम्पादक जी सादर प्रणाम।

यदि भारत में आन्दोलनों का जनक श्री मोहनदास करमचंद गांधी को कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।आपनें नमक,सत्याग्रह, अंग्रेजों भारत छोड़ों आदि सफलतापूर्वक आन्दोलनों को छेंड़ा।और प्रसिद्धि पाई।प्रसिद्ध वैज्ञानिक आइंस्टीन नें कहा था।"कोई हांड़-मांस का पुतला धरती पर चलता-फिरता भी था"।वह अवश्य ही गांधी था।इसमें कोई आश्चर्य नहीं।गांधी में अभूतपूर्व नेतृत्व क्षमता थी।इसके अलावा सुंदरलाल बहुगुणा का चिपको आंदोलन, विनोबा भावे का भूदान आन्दोलन भी भारत के आन्दोलनों में प्रमुख थे।

तब के समय में आन्दोलन अहिंसात्मक और बिना राष्ट्रीय/राजकीय सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले ही हुआ करते थे।

कालांतर में आजादी के बाद आन्दोलनों की राह हिंसात्मक और राष्ट्रीय/राजकीय सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाए बिना कोई आन्दोलन होता ही नहीं है।आन्दोलनों की दशा और दिशा बदल सी गई है।सरकारी सम्पत्ति को कोई अपनी सम्पत्ति समझता ही नहीं है।शत्रु सम्पत्ति की तरह लोगों/आन्दोलनकारियों का व्यवहार होता है।इस तरह के आन्दोलनों को आन्दोलन कहा ही नहीं जा सकता है।गांधीजी नें जो आन्दोलनों की राह भारत ही नहीं डरबन तक जो राह सुझाई थी,आन्दोलन कारी उस राह से भटक गए से लगते हैं।

प्रमोद कुमार दीक्षित, सेहगों, रायबरेली।

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